साम्प्रदायिकता के प्रश्न पर अधिक प्रासंगिक हो गए हैं डॉ. अम्बेडकर : डॉ. चेतराम गर्ग

WhatsApp Channel Join Now
साम्प्रदायिकता के प्रश्न पर अधिक प्रासंगिक हो गए हैं डॉ. अम्बेडकर : डॉ. चेतराम गर्ग


धर्मशाला, 08 सितंबर (हि.स.)। डॉ. अम्बेडकर साम्प्रदायिकता के सभी पहलुओं का विश्लेषण करने के बाद जिन निष्कर्षों पर पहुंचे थे, वह पहले की अपेक्षा अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। अन्य विद्वानों ने जहां किसी एक मत अथवा पंथ को आधार मानकर साम्प्रदायिकता के प्रश्न को विश्लेषित किया था, वहीं डॉ. अम्बेडकर ने साम्प्रदायिकता के मजहबी पक्ष की चर्चा कर इस समस्या को व्यापक रूप में समझने की कोशिश की थी। इसलिए उनकी पुस्तक ’थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ साम्प्रदायिकता के प्रश्न को समझने और उसे सुलझाने का सबसे सत्यनिष्ठ प्रयास बन गई है। यह बात ठाकुर रामसिंह इतिहास शोध संस्थान के निदेशक डॉ. चेतराम गर्ग ने मंगलवार को केन्द्रीय विश्वविद्यालय के आम्बेडकर अध्ययन केन्द्र की ओर से आयोजित संवादमाला के पंचम सत्र में ’असुविधाजनक यथार्थ- थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ विषय पर कहीं।

डॉ. गर्ग ने कहा कि डॉ. अम्बेडकर भारतीय विमर्श के केन्द्र बिन्दु बन गए हैं। इसलिए उनके विचारों को निष्पक्षता के साथ समझना बहुत जरूरी हो गया है। साम्प्रदायिकता के प्रश्न से जूझ रहे भारत को इस समस्या से निपटने के लिए डॉ. अम्बेडकर की पुस्तक ’थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ से प्रभावी सूत्र मिल सकते हैं। उन्होंने कहा कि डॉ. आम्बेडकर की यह मान्यता थी कि हिन्दू समाज में स्वयं को सुधारने की एक प्रक्रिया चलती रहती है, इसलिए उसको साम्प्रदायिकता के प्रश्न के प्रति आसानी से संवेदित किया जा सकता है, लेकिन अन्य मजहबों में स्वयं-सुधार की प्रक्रिया जटिल है, इसलिए भारत में साम्प्रदायिकता का प्रश्न जटिल बन गया है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय की अम्बेडकर पीठ के पूर्व चेयर प्रो. बलवान गौतम ने कहा कि ’थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ को डॉ. आम्बेडकर के अनुभवों के निचोड़ के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि डॉ. आम्बेडकर की बेलौस अभिव्यक्ति इस पुस्तक को विशिष्ट बना देती है। भारत विभाजन के समय साम्प्रदायिकता के जिस प्रश्न से जूझ रहा था, उसकी खुले मन से उन्होंने व्याख्या इस पुस्तक में की है।

इस कार्यक्रम में विषय प्रवर्तन करते हुए अम्बेडकर अध्ययन केन्द्र के प्रभारी और सहायक आचार्य डॉ. किस्मत कुमार ने कहा कि जिस भारत ने 1905 में साम्प्रदायिक आधार पर बंगाल विभाजन को अस्वीकार दिया था, वह देश 1947 में सम्पूर्ण राष्ट्र के विभाजन के लिए कैसे तैयार हो गया, यह शोध का विषय है।

हिन्दुस्थान समाचार / सतेंद्र धलारिया

Share this story