हिमालय हमारी पहचान, विरासत और जिम्मेदारी : राज्यपाल

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हिमालय हमारी पहचान, विरासत और जिम्मेदारी : राज्यपाल


हिमालय हमारी पहचान, विरासत और जिम्मेदारी : राज्यपाल


धर्मशाला, 12 सितंबर (हि.स.)। राज्यपाल कविंद्र गुप्ता ने कहा कि हिमालय केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता, संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और प्राकृतिक जीवन-व्यवस्था का आधार है। हिमालय हमारी पहचान, विरासत और जिम्मेदारी है। इसके संरक्षण को केवल सरकारी प्रयासों तक सीमित न रखकर जन आंदोलन का स्वरूप देना होगा, तभी हिमालय संरक्षण के साथ राष्ट्र निर्माण के संकल्प को मजबूती मिलेगी। राज्यपाल शनिवार को धर्मशाला में हिमालय परिवार, हिमाचल प्रदेश तथा हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “हिमालय संरक्षण से राष्ट्र निर्माण की ओर” विषयक एक दिवसीय संगोष्ठी तथा पुस्तक विमोचन समारोह को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि हिमालय से निकलने वाली नदियां देश के विशाल भू-भाग को जीवन प्रदान करती हैं। यहां की जैव विविधता, पारंपरिक ज्ञान, लोक संस्कृति और प्राकृतिक संसाधन अमूल्य धरोहर हैं। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, जलस्रोतों का संकट, वनाग्नि, भूस्खलन और बादल फटने जैसी आपदाएं हिमालय की संवेदनशीलता की गंभीर चेतावनी दे रही हैं। ऐसे में विकास और पर्यावरण के बीच संघर्ष के बजाय दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना समय की आवश्यकता है।

राज्यपाल ने हाल ही में नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को समझते हुए वैज्ञानिक अध्ययन, समयबद्ध पूर्व चेतावनी प्रणाली, आपदा प्रबंधन की तैयारी तथा स्थानीय समुदायों के प्रशिक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील विकास की दिशा में सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।

राज्यपाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “एक पेड़ मां के नाम” अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण में युवाओं और आम नागरिकों की भागीदारी महत्वपूर्ण है। भारत का विकास तभी सार्थक होगा, जब आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरणीय स्थिरता, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक संरक्षण भी सुनिश्चित हो।

राज्यपाल ने हिमालय परिवार की ओर से प्रस्तुत धर्मशाला घोषणा-2026 का स्वागत करते हुए कहा कि किसी भी घोषणा की सफलता केवल उसके दस्तावेज तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन से होती है। उन्होंने कहा कि हिमालय संरक्षण की शुरुआत प्रत्येक व्यक्ति अपने घर, विद्यालय, गांव और आसपास के पर्यावरण से कर सकता है। प्लास्टिक का उपयोग कम करना, पेड़ों की रक्षा करना, स्थानीय जैव विविधता को समझना, आपदा के समय स्वयंसेवा करना तथा लोक संस्कृति एवं परंपराओं को आगे बढ़ाना ऐसे कदम हैं जिनका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

कार्यक्रम के दौरान विभिन्न विषयों पर प्रकाशित पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। इनमें अशोक बेरी की ”समरस समाज- विकसित भारत का आधार“ तथा प्रेम कैथ की “हैंडबुक आॅन हिमाचल प्रदेश एक्साईज लाॅ“ प्रमुख हैं। राज्यपाल ने लेखकों को बधाई देते हुए कहा कि पुस्तकों के माध्यम से समाज में समरसता, राष्ट्र निर्माण और प्रशासनिक क्षेत्र में व्यावहारिक ज्ञान को बढ़ावा मिलता है।

इस दौरान, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एस.पी. बंसल, हिमालय परिवार के संस्थापक डाॅ. इंद्रेश कुमार ने भी हिमाचल संरक्षण बारे अपने विचार रखे।

इस अवसर पर राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य अशोक बेरी, राष्ट्रीय कार्यकारिणी अध्यक्ष डाॅ. परमजीत सिंह गिल, पंजाब विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के चेयरमैन हिमांशु अग्रवाल, हिमालय परिवार हिमाचल प्रदेश के प्रांतीय अध्यक्ष मोहिंदर सिंह सलारिया, आयोजन से जुड़े पदाधिकारी, विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी तथा विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिभागी उपस्थित रहे।

हिन्दुस्थान समाचार / सतेंद्र धलारिया

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