सीयू के कुलाधिपति प्रो. बेदी ने किया आईआईएएस शिमला में प्रतिष्ठित नेशनल फेलोशिप का पदभार ग्रहण
धर्मशाला, 27 मार्च (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएचपी) के कुलपति प्रो. सत प्रकाश बंसल ने प्रख्यात विद्वान, साहित्यकार व पद्मश्री से सम्मानित विवि के कुलाधिपति प्रो. हरमहेंद्र सिंह बेदी को शिमला स्थित प्रतिष्ठित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (आईआईएएस) में नेशनल फेलोशिप का पदभार ग्रहण करने पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने इसे न केवल प्रो. बेदी की व्यक्तिगत उपलब्धि, बल्कि समूचे शिक्षा जगत और विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के लिए गौरव का क्षण बताया है। यह फेलोशिप शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अधीनस्थ संस्थान द्वारा प्रदान की जाने वाली सर्वोच्च अकादमिक उपाधियों में से एक मानी जाती है, जो किसी विद्वान के योगदान, अनुभव और शोध की गहराई को सार्वभौमिक मान्यता प्रदान करती है।
शिमला में आयोजित समारोह के दौरान प्रो. बेदी ने इस प्रतिष्ठित फेलोशिप को औपचारिक रूप से स्वीकार किया, जिसमें विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित कुलपति प्रो. सत प्रकाश बंसल ने प्रो. बेदी के व्यक्तित्व और कृतित्व की विस्तृत रूप से सराहना की।
प्रो. बंसल ने कहा कि प्रो. हरमहेंद्र सिंह बेदी का व्यक्तित्व केवल एक शिक्षाविद् तक सीमित नहीं है, बल्कि वे साहित्य, शिक्षा और भारतीय ज्ञान परंपरा के ऐसे धरोहर-पुरुष हैं, जिनका अनुभव और विद्वत्ता नई पीढ़ी के शोधार्थियों के लिए महान प्रेरणास्रोत है। उन्होंने विश्वास जताया कि प्रो. बेदी के सुदीर्घ अनुभव और मार्गदर्शन से भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में शोध गतिविधियों को न केवल एक नई दिशा मिलेगी, बल्कि यह शोधकार्य अधिक सार्थक, गहन और राष्ट्रीय चेतना से जुड़े होंगे।
कुलपति प्रो. बंसल ने कहा कि प्रो. बेदी का शैक्षणिक जीवन अत्यंत समृद्ध रहा है, वे 4 जुलाई 2018 से हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलाधिपति के रूप में कार्यरत हैं तथा इससे पूर्व पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला में प्रोफेसर एमेरिटस और गुरु नानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर में हिंदी विभाग के अध्यक्ष के रूप में अपनी अमूल्य सेवाएं दे चुके हैं।
इस अवसर पर प्रो. हरमहेंद्र सिंह बेदी ने भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान द्वारा प्रदत्त इस प्रतिष्ठित फेलोशिप के लिए आभार व्यक्त करते हुए इसे शोध और ज्ञान के क्षेत्र में अधिक योगदान देने की एक बड़ी जिम्मेदारी बताया। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा और समकालीन शोध के बीच एक सुदृढ़ सेतु बनाने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया तथा कहा कि आज के समय में शोध की दिशा केवल पाश्चात्य मानकों तक सीमित न रहे, बल्कि भारतीय चिंतन, दर्शन और साहित्यिक विरासत को भी वैश्विक शोध मानकों के साथ जोड़ते हुए आगे बढ़ना आवश्यक है।
हिन्दुस्थान समाचार / सतेंद्र धलारिया

