पारिस्थितिक संतुलन हेतु गिद्धों का संरक्षण जरूरी : कृषि विश्वविद्यालय में कार्यशाला आयोजित

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पारिस्थितिक संतुलन हेतु गिद्धों का संरक्षण जरूरी : कृषि विश्वविद्यालय में कार्यशाला आयोजित


धर्मशाला, 27 फ़रवरी (हि.स.)। चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर द्वारा डॉ. जी.सी. नेगी पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय में गिद्ध संरक्षण विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रमुख विशेषज्ञों ने भाग लेकर गिद्धों के समन्वित एवं सतत संरक्षण की आवश्यकता पर विचार-विमर्श किया। कार्यशाला में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संरक्षण जीवविज्ञानी क्रिस बाउडेन, वरिष्ठ पशु चिकित्सक एवं पक्षी वन्यजीव संरक्षण विशेषज्ञ डॉ. पर्सी अवारी तथा प्रख्यात पक्षी विज्ञानी डॉ. माल्यास्री भट्टाचार्य ने गिद्धों के पारिस्थितिक, पशु चिकित्सा एवं जनस्वास्थ्य संबंधी महत्व पर प्रकाश डाला।

तकनीकी सत्रों के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि कांगड़ा जिला सुरक्षित आहार स्थलों की उपलब्धता के कारण गिद्धों की अपेक्षाकृत स्वस्थ आबादी को समर्थन प्रदान कर रहा है तथा ऐसे स्थलों के संरक्षण और सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने गिद्धों की उस महत्वपूर्ण पारिस्थितिक भूमिका का उल्लेख किया, जिसके अंतर्गत वे मृत पशुओं को शीघ्रता से नष्ट कर रेबीज़, तपेदिक (टीबी) और प्लेग जैसी जूनोटिक बीमारियों के प्रसार को रोकने में सहायक होते हैं, जिससे पर्यावरणीय स्वच्छता और जनस्वास्थ्य सुरक्षा को बल मिलता है। कार्यशाला में यह भी चिंता व्यक्त की गई कि कुछ पशु-चिकित्सीय गैर-स्टेरॉयडल सूजनरोधी औषधियाँ (एनएसएआईडी) जैसे डाइक्लोफेनाक, निमेसुलाइड एवं एसीक्लोफेनाक दक्षिण एशिया में गिद्धों की संख्या में तीव्र गिरावट के लिए उत्तरदायी रही हैं। पशु चिकित्सकों से आग्रह किया गया कि वे पशुधन उपचार में गिद्ध-सुरक्षित विकल्पों को अपनाएं।

कार्यक्रम के दौरान गिद्ध संरक्षण पर एक ऑनलाइन संवादात्मक प्रश्नोत्तरी का आयोजन भी किया गया, जिसमें विद्यार्थियों ने भाग लिया तथा उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया।

वहीं कुलपति डॉ. अशोक कुमार पांडा ने संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण हेतु वैज्ञानिक सहयोग और उत्तरदायी पशु-चिकित्सीय आचरण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि प्रकृति के इस स्वच्छता प्रहरी की रक्षा के लिए त्वरित और समन्वित प्रयास आवश्यक हैं। कार्यशाला का संयोजन डॉ. अंकुर शर्मा, सहायक प्राध्यापक (पशु चिकित्सा), तथा डॉ. देवेश ठाकुर, सहायक प्राध्यापक (पशु प्रसार शिक्षा) द्वारा किया गया। कार्यक्रम का समापन दीर्घकालिक गिद्ध संरक्षण एवं क्षेत्रीय पारिस्थितिक संतुलन सुनिश्चित करने के लिए सतत अनुसंधान, नीतिगत सहयोग, उत्तरदायी पशु-चिकित्सीय हस्तक्षेप तथा सामुदायिक सहभागिता के सामूहिक आह्वान के साथ हुआ।

हिन्दुस्थान समाचार / सतेंद्र धलारिया

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