आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने विकसित की थ्री डी-प्रिंटेड हड्डी प्रत्यारोपण की विधि

WhatsApp Channel Join Now
आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने विकसित की थ्री डी-प्रिंटेड हड्डी प्रत्यारोपण की विधि


आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने विकसित की थ्री डी-प्रिंटेड हड्डी प्रत्यारोपण की विधि


मंडी, 17 अगस्त (हि.स.)। आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने थ्री डी-प्रिंटेड हड्डी प्रत्यारोपण के लिए एक ऐसी जैव-प्रेरित सतह कोटिंग विकसित की है, जो बैक्टीरिया को यांत्रिक रूप से नष्ट करने के साथ-साथ प्रत्यारोपण के हड्डी के साथ बेहतर जुड़ाव में मदद कर सकती है। यह शोध केमिकल इंजिनिरिंग जरनल में प्रकाशित हुआ है। इसमें जैव-अपघटनीय प्लास्टिक स्कैफोल्ड पर समुद्री अर्चिन जैसी दिखने वाली हाइड्रॉक्सीएपेटाइट की सूक्ष्म संरचनाओं का इस्तेमाल किया गया है। इसका उद्देश्य ऑर्थोपेडिक इम्प्लांट से जुड़ी दो प्रमुख समस्याओं—बैक्टीरियल संक्रमण और हड्डी के साथ कमजोर जुड़ाव—से निपटना है। दुर्घटनाओं, संक्रमण या ट्यूमर को हटाने के कारण होने वाले बड़े हड्डी दोषों का उपचार आज भी एक बड़ी चुनौती है। हालांकि, पॉलीलैक्टिक एसिड से बने थ्री डी-प्रिंटेड इम्प्लांट को मरीज की हड्डी में हुए दोष के अनुरूप तैयार किया जा सकता है, लेकिन पॉलीलैटिक्टिक एसिड की जल-विकर्षी हाइड्रोफोबिक प्रकृति के कारण इसका हड्डी के साथ आसानी से जुड़ना मुश्किल होता है। इसके अलावा, बैक्टीरिया के इम्प्लांट की सतह पर चिपकने और बायोफिल्म बनाने से संक्रमण हो सकता है, जिससे इम्प्लांट विफल होने और दोबारा सर्जरी की आवश्यकता का जोखिम बढ़ जाता है।

इस शोध दल का नेतृत्व डॉ. सुमित मुराब ने किया। टीम में अंकिता नेगी, आकाश वर्मा, के. एम. मोहम्मद सुफियान और वेदांते मिश्रा शामिल हैं। शोधकर्ताओं ने हाइड्रॉक्सीएपेटाइट का उपयोग करके दोहरी-परत वाली कोटिंग विकसित की है। हाइड्रॉक्सीएपेटाइट मानव शरीर की हड्डी का एक प्रमुख घटक है।

इस कोटिंग को तैयार करने की प्रक्रिया दो चरणों में पूरी की जाती है। पहले चरण में थ्री डी-प्रिंटेड पीएलए स्कैफोल्ड की सतह को एक क्षारीय घोल से उपचारित करके सक्रिय किया जाता है, जिससे खनिजों के जमाव के लिए आवश्यक स्थान तैयार होते हैं। दूसरे चरण में स्कैफोल्ड को 90° सें. पर हाइड्रोथर्मल उपचार दिया जाता है, जिससे समुद्री अर्चिन जैसी संरचना वाले हाइड्रॉक्सीएपेटाइट के सुईनुमा समूह सतह पर विकसित होते हैं। इससे ऐसी सतह तैयार होती है, जो हड्डी के अनुकूल खनिजीकरण के साथ-साथ ऐसी सूक्ष्म संरचनाएं भी प्रदान करती है जो बैक्टीरिया को यांत्रिक रूप से नुकसान पहुंचा सकती हैं। यह तरीका एंटीबायोटिक्स या रासायनिक जीवाणुरोधी पदार्थों के इस्तेमाल से अलग है। थ्रीडी प्रिंटिंग के माध्यम से इम्प्लांट को मरीज की आवश्यकता के अनुसार तैयार करने की क्षमता है। हाइड्रॉक्सीएपेटाइट आधारित बायोमिमेटिक सतह कोटिंग तकनीक विकसित करने की दिशा में एक आशाजनक विकल्प हो सकता है। जो हड्डी के साथ बेहतर जुड़ाव में मदद करे और बैक्टीरिया के जमाव की संभावना को कम करे।

यह अपेक्षाकृत सरल और कम तापमान पर की जाने वाली सतह संशोधन तकनीक जैव-अपघटनीय पॉलिमर से बने ढांचों के गुणों में बदलाव के लिए भी एक संभावित विकल्प बन सकती है।

शोध दल के अनुसार भविष्य में इसका उपयोग ऑर्थोपेडिक और डेंटल इम्प्लांट के साथ-साथ ऐसे अन्य जैव-चिकित्सीय उपकरणों में भी किया जा सकता है। जहां संक्रमण की रोकथाम महत्वपूर्ण है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा

Share this story