स्टाम्प पेपर पर लिखा तलाकनामा अदालत की मंजूरी के बिना मान्य नहीं : हाई कोर्ट
शिमला, 11 सितंबर (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत केवल स्टाम्प पेपर पर लिखे गए तलाकनामा के आधार पर विवाह विच्छेद को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी प्रचलित परंपरा के तहत तलाक का दावा किया जाता है तो उस परंपरा और उसके आधार पर हुए तलाक को ठोस गवाहों और साक्ष्यों से साबित करना जरूरी है। अदालत की मंजूरी के बिना या स्थापित परंपरा के पुख्ता प्रमाण के अभाव में ऐसा तलाकनामा मान्य नहीं होगा।
न्यायाधीश राकेश कैंथला ने चम्बा जिले से जुड़े एक पुराने भूमि विवाद में दायर अपील को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। मामला श्रीधर नामक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनकी भूमि के मालिकाना हक को लेकर था। वादी भिंद्रो ने सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर दावा किया था कि श्रीधर ने 11 सितम्बर 1997 को उनके पक्ष में एक पंजीकृत वसीयत की थी। उन्होंने कहा था कि श्रीधर ने अपनी पहली पत्नी कौंतो को 21 मई 1976 को तलाक दे दिया था और इसके बाद कौंतो ने शिव राम नामक व्यक्ति से दूसरी शादी कर ली थी।
मामले में कौंतो ने खुद को श्रीधर की कानूनी विधवा बताया। उन्होंने अपनी बेटी को श्रीधर की वारिस बताते हुए वसीयत को फर्जी और संदेहास्पद करार दिया था। विवाद में स्टाम्प पेपर पर लिखे उस कथित तलाकनामा को भी आधार बनाया गया था, जिसके जरिए यह दावा किया गया था कि श्रीधर और कौंतो के बीच वर्ष 1976 में विवाह संबंध समाप्त हो गया था। हाईकोर्ट ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया और कहा कि केवल इस दस्तावेज के आधार पर तलाक साबित नहीं होता।
अदालत ने कहा कि हिंदू धर्म में विवाह को संस्कार माना गया है। ऐसे में प्रथागत तलाक का दावा करने वाले पक्ष को यह साबित करना होगा कि संबंधित समुदाय में ऐसी परंपरा मौजूद है और उसी के अनुसार तलाक हुआ था। इसके लिए अदालत के सामने ठोस गवाह और विश्वसनीय साक्ष्य पेश करना आवश्यक है। उच्च न्यायालय ने मामले में मृतक श्रीधर की ओर से निष्पादित पंजीकृत वसीयत को वैध माना और इसी आधार पर अपील खारिज कर दी।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा

