छाेटी काशी मंडी में सनातन का उद्घोष: हिंदू वही, जो सबको साथ लेकर चले : प्रेम कुमार

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छाेटी काशी मंडी में सनातन का उद्घोष: हिंदू वही, जो सबको साथ लेकर चले : प्रेम कुमार


मंडी, 17 जनवरी (हि.स.)। ​छोटी काशी मंडी की पावन धरा मंडी के ऐतिहासिक सेरी मंच पर शनिवार को आयोजित 'हिंदू सम्मेलन' में सनातन का उदघोष हुआ। यह केवल एक समागम नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की जीवंतता और हिंदू समाज की अटूट एकजुटता का एक शक्तिशाली शंखनाद था। इस सम्मेलन ने एक बार फिर वैश्विक पटल पर यह स्पष्ट कर दिया कि हिंदुत्व कोई संकुचित विचार या मजहबी कट्टरता नहीं है, बल्कि वह उदार जीवन पद्धति है जो 'वसुधैव कुटुंबकम्' के शाश्वत मंत्र को अपने भीतर आत्मसात करती है। आयोजन का मुख्य केंद्र बिंदु सामाजिक समरसता और राष्ट्र के प्रति समर्पण रहा, जिसने हज़ारों की संख्या में उपस्थित जनसमूह को नई ऊर्जा से भर दिया।

​सम्मेलन के मुख्य वक्ता प्रेम कुमार ने अपने संबोधन में एक अत्यंत गहन और प्रेरक सूत्र दिया— हिंदू वह है, जो सबको साथ लेकर चलने वाला हो। यह वाक्य सनातन धर्म की उस मूल आत्मा को दर्शाता है जहाँ ऊंच-नीच और भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हिंदुत्व का वास्तविक अर्थ केवल विशेष पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सेवा, संस्कार और सामाजिक समरसता का पर्याय है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सौ वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित ये कार्यक्रम समाज को जोड़ने का एक पवित्र माध्यम हैं। प्रेम ने हिंदू धर्म में 'जनगणना के धर्म' से ऊपर उठकर 'कर्म के धर्म' को प्राथमिकता देने की बात कही।

उन्होंने युवाओं का विशेष आह्वान करते हुए कहा कि धर्म और संस्कारों की रक्षा का दायित्व अब नई पीढ़ी के कंधों पर है। जब हम भारत को 'माता' कहते हैं, तो उसकी रक्षा का संकल्प हमारी रगों में रक्त बनकर दौड़ना चाहिए।

​सम्मेलन के दौरान सनातन परंपरा के गौरवशाली इतिहास और उसके प्रतिरोध की गाथा को भी प्रमुखता से रखा गया। वक्ताओं ने स्मरण कराया कि लगभग एक हजार वर्षों तक विदेशी आक्रांताओं ने भारत की समृद्धि को लूटा, हमारे पवित्र मंदिरों को खंडित किया और समाज पर अनगिनत प्रहार किए। किंतु, तमाम झंझावातों और भीषण संघर्षों के बावजूद 'सनातन का ध्वज' कभी नहीं झुका। यह वह वीर प्रसूता धरती है जहां ऋषियों, महापुरुषों और शौर्यवान योद्धाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर संस्कृति की रक्षा की। आज हिंदू समाज में जो नव-जागृति दिखाई दे रही है, वह उन्हीं महापुरुषों के कठिन तप और बलिदान का मीठा फल है। हिंदुत्व हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन समय में भी अपने नैतिक मूल्यों और सत्य के मार्ग से विचलित नहीं होना है।

​सम्मेलन में हिंदू समाज की 'सेवा भावना' को सनातन का सबसे मानवीय चेहरा बताया गया। वर्तमान में विश्व की कई ताकतें मतांतरण के कुत्सित षड्यंत्र रच रही हैं, किंतु सनातन का 'अन्नदान' और 'नर सेवा ही नारायण सेवा' का भाव इन मंसूबों को विफल करने के लिए पर्याप्त है। हिंदू समाज वह है जो किसी प्यासे को जल या भूखे को अन्न खिलाते समय कभी उसका धर्म, पंथ या जाति नहीं पूछता। सनातन के पांच आधारभूत तत्वों—प्रकृति प्रेम, ग्रंथ और गुरु के प्रति श्रद्धा, नारी शक्ति का सम्मान, आध्यात्मिक चेतना और आत्म-मंथन—को जीवन की आधारशिला बताया गया। विशेषकर 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते' के भाव को व्यावहारिक जीवन में उतारने पर बल दिया गया।

​सम्मेलन के अध्यक्ष महंत विष्णु मोहन दास ने एक मर्मस्पर्शी प्रश्न समाज के सम्मुख रखा कि क्या समय आ गया है कि हिंदुओं को जगाने के लिए सम्मेलन करने पड़ रहे हैं यह प्रश्न आत्म-मंथन की प्रेरणा देता है। सनातन संस्कृति को सहेजने के लिए किसी बाहरी आह्वान की प्रतीक्षा करने के बजाय, प्रत्येक हिंदू को अपने दैनिक आचरण में संस्कारों को समाहित करना होगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा

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