अट्ठारह साल तक सेवा लेने के बाद भी नियमित नहीं किया, हाई कोर्ट ने सरकार को याद दिलाया कर्तव्य

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अट्ठारह साल तक सेवा लेने के बाद भी नियमित नहीं किया, हाई कोर्ट ने सरकार को याद दिलाया कर्तव्य


अट्ठारह साल तक सेवा लेने के बाद भी नियमित नहीं किया, हाई कोर्ट ने सरकार को याद दिलाया कर्तव्य


शिमला, 08 अप्रैल (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने लंबे समय तक अस्थायी कर्मचारियों से सेवाएं लेने के बावजूद उन्हें नियमितीकरण का लाभ न देने के मामले में राज्य सरकार को उसका कर्तव्य याद दिलाया है। अदालत ने कहा कि जिन कर्मचारियों ने लंबे समय तक लगातार सेवा दी है, उन्हें नियमित करने पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बी.सी. नेगी की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए न्यायाधीश सत्येन वैद्य की एकल पीठ के फैसले को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि यह स्वीकार किया जा चुका है कि याचिकाकर्ता जोती ठाकुर वर्ष 2008 से नाममात्र के अंतराल के साथ लगातार सेवाएं दे रही हैं और लगभग 18 वर्षों से वन विभाग से जुड़े विभिन्न परियोजनाओं में कार्यरत रही हैं।

मामले में राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया था कि जोती ठाकुर कभी भी वन विभाग या हिमाचल प्रदेश सरकार की नियमित कर्मचारी नहीं थीं। सरकार ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को वर्ष 2014 में ही कार्रवाई का कारण मिल गया था, लेकिन उन्होंने वर्ष 2024 में अदालत का रुख किया, जिससे लगभग 10 वर्ष की देरी हुई है।

अदालत के सामने यह तथ्य रखा गया कि जोती ठाकुर को 25 जुलाई 2008 को स्वां नदी एकीकृत जलसंभर विकास परियोजना में समूह आयोजक के रूप में नियुक्त किया गया था और उन्होंने 30 जून 2016 तक वहां कार्य किया। इसके बाद उन्होंने हिमाचल प्रदेश वन पारिस्थितिकी तंत्र जलवायु-प्रतिरोध परियोजना में 1 नवंबर 2016 से 30 सितंबर 2017 तक ग्राम समूह आयोजक के रूप में सेवाएं दीं। वर्तमान में वह 9 मार्च 2018 से स्रोत स्थिरता और जलवायु वर्षा-आधारित कृषि के लिए एकीकृत विकास परियोजना (आईडीपी) में सामाजिक विस्तार अधिकारी के रूप में कार्य कर रही हैं।

इससे पहले एकल पीठ ने याचिकाकर्ता की याचिका स्वीकार करते हुए निर्देश दिए थे कि उनकी छह वर्ष की अनुबंध सेवा पूरी होने के बाद 6 जनवरी 2016 से उनकी सेवा नियमित करने पर सभी परिणामी लाभों सहित विचार किया जाए। हालांकि वित्तीय लाभों को याचिका दायर करने की तिथि से तीन वर्ष पहले तक ही सीमित रखा गया था।

खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को सही मानते हुए राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि लंबे समय तक निरंतर सेवा देने वाले कर्मचारियों को नियमितीकरण का लाभ देने पर सरकार को अपने दायित्व का पालन करना चाहिए।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा

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