हिमाचल के जंगलों में ग्लाइफोसेट के ज़हर से लिखी जा रही तबाही की इबारत...

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हिमाचल के जंगलों में ग्लाइफोसेट के ज़हर से लिखी जा रही तबाही की इबारत...


हिमाचल के जंगलों में ग्लाइफोसेट के ज़हर से लिखी जा रही तबाही की इबारत...


मंडी, 21 अगस्त (हि.स.)। प्रकृति मानव की हर जरूरत को पुरा कर सकती है, लेकिन आदमी के लालच का घड़ा नहीं भर सकती है। हिमाचल के ऊंचाई वाले क्षेत्रों वाले जंगलों में ग्लाइफोसेट नामक जहर डालकर तबाही की इबारत लिखी जा रही है। वन भूमि में अवैध कब्जों की कड़ी में अब लोग ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लाइफोसेट जहर का इस्तेमाल कर प्राकृतिक रूप से उगे घास की परत को हटाकर मटर की खेती कर रहे हैं। यह कार्य अपनी निजी भूमि के बजाय वन भूमि में अवैध रूप से मटर की खेती करने के लिए बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। मंडी-कुल्लू, शिमला, सोलन क्षेत्र से इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं। मामला सामने आने पर अब वन विभाग सक्रिय हुआ है।

मंडी जिला के नाचन वन मंडल के थाची वन परिक्षेत्र में मटर की अवैध फसल को उखाड़ने की कवायद वन विभाग द्वारा शुरू कर दी गई है। इसके बावजूद सराज क्षेत्र के अन्य इलाकों बागाचनोगी, शिल्हीबागी, रोड़, चेत और छतरी क्षेत्र में अभी भी यह क्रम जारी है। मानवीय लालच के चलते पर्यावरण और लोगों की सेहत के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है। जंगलों में मटर की अगेती फसल के लिए इस जहर को प्रयोग कर जमीन साफ की जाती है और मटर की बिजाई कर चोखे दाम वसूले जाते हैं। लेकिन इस खतरानक रसायन का छिड़काव करने से वनस्पति सूख जाती है। जमीन कमजोर हो जाने से भूमि कटाव का खतरा बए़ जाता है। वहीं पेयजल स्रोतों के प्रदूषित होने से जीवन खतरे में पड़ जाता है।

इधर, सेवानिवृत आईएफएस अधिकारी डा. अशेक सोमल ने इस बारे में प्रधान अरण्यपाल हिमाचल प्रदेश डा1 संजय सूद को पत्र लिखकर इस तबाही को रोकने की मांग की है। उनका कहना है इससे पहाड़ मजोर पड़ जाते हैं और भू-स्खलन का खतरा बए़ जाता है। पेड़-पौधे और झाड़ियाें की जड़े मिट्टी और पहाड़ों की ढलानों को बांधे रखती है, इनके नष्ट होने से मिट्टी की पकड़ कमजोर हो जाती है।

वहीं हिमालय नीति अभियान और पर्यावरण प्रेमी गुमान सिंह ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर ग्लाइफोसेट के छिड़काव को गंभीर बताते हुए इस पर तत्काल रोक की मांग की है। इसके छिड़काव से जंगल की घास और पेड़ पौधे सूख जाते हैं और जंगल खाली हो जाता है। उन्होंने कहा कि यह कृत्य वन संरक्षण अधिनियम 1980, भारतीय वन अधिनियम 1972 तथा जैव विविधता अधिनियम 2002 का खुला उल्लंघन्न है। मुख्यमंत्री से मांग की गई है कि ग्लाइफासेट 41 प्रतिशत एसएल और इसके सभी वयापारिक नाम जैसे राउंडअप, ग्लाइसेल, गरूड़, हाईजैक, ग्लाईफोस डस्टर आदि की बिक्री और भंडारण पर केरल की तर्ज पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। और आवश्यक्ता होने पर कड़ी कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाए। वहीं से इस तरह के मामलों की शिकायत मिली है। वहां मिट्टी , जल, वनस्पति एवं जैव विविधता की वैाानिक जांच करवाई जाए। पेयजल स्रोतों के पानी की गुणवत्ता की जांच के लिए रासायनिक अवशेष परीक्षण किए जाएं।

उन्होंने कहा कि वन केवल सरकारी भमि नहीं है। अपितु हिमाचल प्रदेश की जल सुरक्षा, जैव विविधता, कृषि, पर्यटन, स्थानीय आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का आधार हैं। इसलिए वन भूमि पर रासायनिक रूप से वनस्पति नष्ट कर कृषि अतिक्रमण की प्रवृत्ति को केवल कानून-व्यवस्था का विषय न मान कर वन संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और सार्वजनिक हित का गंभीर माना जाना चाहिए।

डीएफओ नाचन एसएस कश्यप ने बताया कि इस मामले में हमारी जीरो टॉलरेंस की नीति है। हम टीमें बनाकर पूरे क्षेत्र में कार्रवाई कर रहे हैं और ऐसे लोगों की पहचान की जा रही है। उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी। वह बताते हैं कि हमने अब तक पांच छोटे-छोटे पैच में मटर की खेती नष्ट की है, यह क्रम अभी जारी है।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा

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