मनोहर सरकार में शिक्षा मंत्री रहे कंवरपाल ने ट्रांसफर पॉलिसी पर उठाए सवाल

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नकारात्मक प्रभाव को रोकने के लिए संशोधन जरूरी

यमुनानगर, 03 जनवरी (हि.स.)। हरियाणा के पूर्व शिक्षा मंत्री कंवर पाल ने मौजूदा ऑनलाइन ट्रांसफर पॉलिसी पर सवाल उठाते हुए इस पर पुनर्विचार की मांग उठाई है। कंवर पाल मनोहर सरकार में प्रदेश के शिक्षा मंत्री रह चुके हैं। उनके कार्यकाल में भी ऑनलाइन ट्रांसफर पॉलिसी में संशोधन को लेकर विवाद होते रहे हैं। अब मौजूदा शिक्षा मंत्री महिपाल ढांडा के कार्यकाल में यह पॉलिसी कई संशोधन के बाद धरातल पर लागू की गई है। जिस पर पूर्व शिक्षा मंत्री ने सवाल उठाए हैं।कंवर पाल ने महिपाल ढांडा को पत्र लिखकर नीति के एक अहम प्रावधान पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। पूर्व मंत्री ने पत्र में कहा है कि नई ट्रांसफर पॉलिसी के तहत किसी एक ब्लॉक में 15 वर्ष की निरंतर सेवा पूरी कर चुके या करने वाले शिक्षकों को अनिवार्य रूप से ट्रांसफर प्रक्रिया में शामिल किया जा रहा है। यह प्रावधान व्यवहारिक रूप से कई शैक्षणिक ब्लॉकों, विशेषकर पहाड़ी और पहाड़ी क्षेत्रों से सटे इलाकों के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है।

कंवरपाल गुर्जर ने छछरौली, सढ़ौरा, नारायणगढ़ और कालका जैसे क्षेत्रों का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि इन इलाकों में शिक्षक अक्सर ट्रांसफर के बाद वापस नहीं आते और उनके स्थान पर नए शिक्षकों की नियुक्ति भी समय पर नहीं हो पाती। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और स्कूलों की कार्यप्रणाली पर पड़ता है। अपने शिक्षा मंत्री के कार्यकाल का जिक्र करते हुए गुर्जर ने बताया कि वर्ष 2004, 2007 और 2011 बैच के शिक्षकों को उन्होंने जिला आवंटन कर दिया था, जिसके बाद सभी शिक्षक अपने-अपने जिलों में कार्यरत हो गए।

इसका परिणाम यह हुआ कि आज छछरौली क्षेत्र के स्कूलों में 35 प्रतिशत से अधिक शिक्षक पद खाली पड़े हैं। पूर्व मंत्री का कहना है कि नई ट्रांसफर पॉलिसी लागू होने से यह स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है। पहाड़ी क्षेत्रों के स्कूल सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, जहां पहले से ही शिक्षकों की भारी कमी है। उन्होंने यह भी कहा कि छछरौली भले ही प्रशासनिक रूप से विकास खंड बन चुका हो, लेकिन अब तक उसे शिक्षा ब्लॉक का दर्जा नहीं मिल पाया है, जिससे समस्याएं और बढ़ गई हैं।

कंवरपाल गुर्जर ने स्पष्ट किया कि वे ट्रांसफर पॉलिसी के विरोध में नहीं हैं, लेकिन इसके नकारात्मक प्रभावों को रोकने के लिए संशोधन बेहद जरूरी है। खासतौर पर 15 साल की अनिवार्य ट्रांसफर शर्त पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि शिक्षा मंत्री इस मुद्दे को गंभीरता से लेंगे और छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाएंगे। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पहाड़ी और दूरदराज़ क्षेत्रों में शिक्षकों की कमी और बढ़ी, तो इसका सीधा असर सरकारी स्कूलों में नामांकन, परीक्षा परिणाम और शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ेगा। ऐसे में ट्रांसफर पॉलिसी को क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुरूप लचीला बनाना समय की मांग माना जा रहा है।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार

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