हिसार : एलएडीसीएस योजना वापस लेने की मांग तेज, ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन ने उठाए सवाल

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हिसार : एलएडीसीएस योजना वापस लेने की मांग तेज, ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन ने उठाए सवाल


‘निष्पक्ष सुनवाई और

अपनी पसंद के अधिवक्ता चुनने के अधिकार से कोई समझौता स्वीकार नहीं

हिसार, 01 अगस्त (हि.स.)। ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन ने लीगल एड डिफेंस काउंसिल

सिस्टम (एलएडीसीएस) योजना को तत्काल प्रभाव से वापस लेने की मांग करते हुए कहा है कि

वर्तमान स्वरूप में यह व्यवस्था संविधान की मूल भावना, निष्पक्ष सुनवाई, प्राकृतिक

न्याय और अभियुक्त को अपनी पसंद के अधिवक्ता से बचाव कराने के अधिकार को प्रभावित करती

है। यूनियन ने केंद्र सरकार, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) और राज्य विधिक

सेवा प्राधिकरणों से इस योजना की व्यापक समीक्षा कर इसे वापस लेने तथा पुरानी विधिक

सहायता व्यवस्था को बहाल करने की मांग की है।

ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन के राज्य उपाध्यक्ष सोम दत्त शर्मा और राज्य काउंसिल

सदस्य डॉ. अर्जुन सिंह ने शनिवार काे कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद-21 प्रत्येक

नागरिक को निष्पक्ष एवं न्यायपूर्ण सुनवाई का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद-22(1)

प्रत्येक गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के अधिवक्ता से परामर्श लेने और उसके माध्यम

से अपना बचाव करने का संवैधानिक अधिकार प्रदान करता है। उनका कहना है कि विधिक सहायता

व्यवस्था का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को न्याय दिलाना है, न कि उनके अधिवक्ता

चुनने के अधिकार को सीमित करना। उन्होंने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई का अर्थ केवल अदालत

में मुकदमे की सुनवाई नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि अभियुक्त को स्वतंत्र,

सक्षम और अपनी पसंद के अधिवक्ता के माध्यम से प्रभावी बचाव का अवसर मिले। यदि किसी

व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी विशेष विधिक सहायता अधिवक्ता को स्वीकार करने

के लिए बाध्य किया जाता है या उसकी पसंद के अधिवक्ता तक पहुंच सीमित होती है, तो यह

प्राकृतिक न्याय और निष्पक्ष सुनवाई की मूल भावना के विपरीत है।

युवा अधिवक्ताओं के हितों पर भी जताई चिंता

यूनियन ने यह भी कहा कि वर्तमान एलएडीसीएस प्रणाली के कारण स्वतंत्र रूप से

प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ताओं, विशेषकर आपराधिक मामलों की पैरवी करने वाले युवा वकीलों

के रोजगार और कार्यक्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। यूनियन का कहना है कि कानूनी

सहायता के मामलों का सीमित संख्या में संविदा अधिवक्ताओं तक सिमट जाना स्वतंत्र बार

की परंपरा और अधिवक्ता पेशे की स्वायत्तता के लिए भी चिंता का विषय है। यूनियन ने कहा

कि पहले की विधिक सहायता प्रणाली अधिक पारदर्शी और प्रभावी थी, जिसमें प्रत्येक वर्ष

नए अधिवक्ताओं का पैनल तैयार किया जाता था और अधिक संख्या में वकीलों को अवसर मिलता

था। उनका मानना है कि यही व्यवस्था न्याय के सिद्धांतों और अधिवक्ताओं के हितों के

अधिक अनुकूल है।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश्वर

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