प्राकृतिक कृषि मिशन को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित प्रयास आवश्यक: आचार्य देवव्रत
चंडीगढ़, 07 जून (हि.स.)। गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कहा कि प्राकृतिक कृषि मिशन को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित प्रयास आवश्यक हैं , अगर इस तरफ ध्यान नहीं दिया गया तो खेती की जमीन बंजर हो जाएगी।
राज्यपाल रविवार काे कुरुक्षेत्र में हरियाणा के कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा प्राकृतिक खेती को बढ़ावा एवं क्लस्टर गठन कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित कृषि कार्यशाला में बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, हरियाणा के कृषि मंत्री श्याम सिंह राणा भी उपस्थित थे।
राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने इस बात पर जोर दिया कि प्राकृतिक कृषि अब देश की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद के उस दौर को याद किया जब कृषि वैज्ञानिकों ने खाद्य आत्मनिर्भरता के लिए प्रति हेक्टेयर 13 किलोग्राम नाइट्रोजन के प्रयोग की सलाह दी थी। इसके विपरीत, वर्तमान में प्रति एकड़ 13 बोरी रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। यूरिया, डीएपी और कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग के साथ-साथ गंभीर बीमारियों में भी वृद्धि हुई है।
उन्होंने इस बात पर बल दिया कि केवल रासायनिक उर्वरकों का उपयोग बढ़ाने से उत्पादन में वृद्धि नहीं होगी; बल्कि प्राकृतिक कृषि के माध्यम से मृदा उर्वरता बढ़ाना आवश्यक है। राज्यपाल ने कहा कि किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करने हेतु प्रशिक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कृषि विभाग के सभी अधिकारियों और राज्य विश्वविद्यालयों के कृषि वैज्ञानिकों से इस प्रयास में सहयोग करने का आग्रह किया। हरियाणा सरकार द्वारा किसानों के लिए आयोजित किये जा रहे प्रशिक्षण की सराहना की।
उन्होंने कार्यशाला में किसानों से पूछा, क्या हम अपने बच्चों के लिए बंजर भूमि छोड़ देंगे? क्या हम उन्हें प्रदूषित हवा और पानी के साथ छोड़ देंगे? क्या हम सभी को गंभीर बीमारियों के साथ छोड़ देंगे? क्या हम किसानों को कर्ज में डूबे रहने देंगे? अगर हम इस स्थिति को बदलना चाहते हैं, तो प्राकृतिक खेती को अपनाना अनिवार्य है। राज्यपाल ने चेतावनी दी कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता लगातार घट रही है और देश की भूमि का ऑर्गेनिक कार्बन स्तर गंभीर रूप से कम हो गया है, जिससे भूमि बंजर होने की स्थिति में पहुंच रही है। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए न तो शुद्ध भोजन उपलब्ध रहेगा और न ही पीने योग्य पानी।
प्राकृतिक खेती को समाधान बताते हुए उन्होंने कहा कि यह देशी गाय आधारित, कम लागत वाली और पर्यावरण के अनुकूल पद्धति है। इसमें गोबर, गोमूत्र, गुड़ और बेसन जैसे साधारण तत्वों से सूक्ष्म जीवाणुओं की वृद्धि कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जाती है। आचार्य देवव्रत ने कहा कि प्राकृतिक खेती ही एकमात्र विकल्प है जो इन सभी समस्याओं का समाधान कर सकता है। उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि वे अपनी जमीन के छोटे से हिस्से पर भी प्राकृतिक खेती शुरू करें।
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव शर्मा

