नशे तस्कराें पर कार्रवाई पुलिस ने बदली रणनीति,ग्राहक व सप्लायर निशाने पर
पैसा बना कमजोर कड़ी, मनी ट्रेल से खुल रहे नेटवर्क
चंडीगढ़, 03 जनवरी (हि.स.)। हरियाणा में नशे के खिलाफ लड़ाई अब सिर्फ तस्करों को पकड़ने की कवायद नहीं रही। पुलिस और प्रशासन इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि जब तक नशे की मांग बनी रहेगी, सप्लाई के रास्ते अपने आप निकलते रहेंगे। इसी समझ के साथ 2025 में हरियाणा पुलिस और हरियाणा राज्य नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने अपनी रणनीति बदलते हुए नशे की मांग व आपूर्ति - दोनों पर एक साथ वार शुरू किया।
यह बदलाव जमीन पर साफ दिखा। कार्रवाई अब सिर्फ बरामदगी तक सीमित नहीं रही, बल्कि नशा तस्करी के नेटवर्क, पैसे के प्रवाह और सामाजिक स्वीकार्यता - तीनों को निशाना बनाया गया। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक पहले कार्रवाई अक्सर खेप तक सिमट जाती थी। अब फोकस है सप्लाई नेटवर्क मैपिंग पर है। कहां से माल आ रहा है, किसके जरिए आगे बढ़ रहा है और किस स्तर पर पैसा बदल रहा है। नशा कारोबार की असली ताकत उसका मुनाफा होता है। इसे तोड़ने के लिए वित्तीय जांच को अभियान का केंद्रीय हिस्सा बनाया गया। जांच एजेंसियों ने नशे से अर्जित संपत्तियों की पहचान शुरू की। कोठियां, प्लॉट, गाड़ियां और बैंक खाते जांच के दायरे में आए। पुलिस का मानना है कि जब तस्करों को यह एहसास हो जाता है कि अवैध कमाई न तो छुपाई जा सकती है और न बचाई जा सकती है, तो नेटवर्क खुद-ब-खुद कमजोर पड़ता है।
इस अभियान में तकनीक की भूमिका निर्णायक रही। मोबाइल डेटा, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, डिजिटल भुगतान और लोकेशन एनालिसिस के जरिए तस्करों की गतिविधियों की पूरी तस्वीर सामने लाई गई। खुफिया सूचनाओं और तकनीकी इनपुट के मेल से कई पुराने नेटवर्क उजागर हुए, जो सालों से सक्रिय थे लेकिन सीधे तौर पर कभी पकड़े नहीं गए थे।हरियाणा पुलिस महानिदेशक अजय सिंघल ने शनिवार काे जारी बयान में कहा कि नशा तस्करी के मामलों में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाएगी। आदतन तस्करों पर नजरबंदी, अवैध संपत्तियों पर कार्रवाई और मजबूत अभियोजन - तीनों को एक साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। सिर्फ सप्लाई रोकना काफी नहीं। जब तक समाज में नशे की मांग रहेगी, तस्करी चलती रहेगी। इसी सोच के तहत नशे के खिलाफ सामाजिक माहौल बनाने पर जोर दिया गया। स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता कार्यक्रम, गांवों में सामाजिक-धार्मिक संकल्प और युवाओं के बीच सोशल मीडिया अभियानों के जरिए नशे को सामाजिक रूप से अस्वीकार्य बनाने की कोशिश की गई। जब समाज खुद नशे को नकारने लगता है, तब पुलिस की कार्रवाई कई गुना असरदार हो जाती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव शर्मा

