गुरुग्राम: श्रीदुर्गा रामलीला में एआई तकनीक से लीला को बनाया दिलचस्प

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गुरुग्राम: श्रीदुर्गा रामलीला में एआई तकनीक से लीला को बनाया दिलचस्प


-जैकबपुरा में शुरू हुई श्री दुर्गा रामलीला, नारद मोह लीला से शुरुआत

गुरुग्राम, 10 अक्टूबर (हि.स.)। जैकबपुरा स्थित श्रीदुर्गा रामलीला की भव्य शुरुआत शुक्रवार रात से कर दी गई। इस बार की रामलीला को पहले से भी भव्य और तकनीक आधारित दिखाया जा रहा है। रामलीला परिसर किसी थियेटर जैसा अहसास दिल रहा है, वहीं एआई का भी रामलीला में इस्तेमाल करके और बेहतरीन बनाया गया है।

बाबा प्रकाश पुरी जी महाराज के परम शिष्य रवि पुरी जी महाराज, गोपाल दास बत्रा, पवन सचदेव, यश अरोड़ा ने ऋषभ वशिष्ठ, तान्या भव्य, भावेश सलूजा विधि-विधान से पूजा करके रामलीला का श्रीगणेश किया। इसके बाद कलाकारों ने लीला का मंचन किया।

रामलीला मंचन में कमेटी के चेयरमैन बनवारी लाल सैनी, प्रधान कपिल सलूजा, महासचिव अशोक प्रजापति और कोषाध्यक्ष प्रदीप गुप्ता समेत अन्य पदाधिकारी और सदस्य मौजूद रहे। विधायक मुकेश शर्मा ने रामलीला कमेटी के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि यह गुरुग्राम की सबसे पुरानी रामलीलाओं में से एक है, जिसकी शुरुआत हमारे बुजुर्गों ने की थी। युवा पीढ़ी इस धार्मिक विरासत को बहुत अच्छे से संभाल रही है। रामलीला के मीडिया प्रभारी राजकुमार सैनी ने बताया कि जो दर्शक ग्राउंड में नहीं आ पाए, उनको सोशल मीडिया पर सीधा प्रसारण किया जा रहा है।

रामलीला की शुरुआत नारद जी के तप से शुरू हुई। नारायण-नारायण के जाप के साथ नारद जी भजनों के माध्यम से हिमालय पर्वत पर से जा रहे थे। हिमालय पर्वत में एक बड़ी पवित्र गुफा थी।

वह परम पवित्र गुफा नारद जी को अत्यन्त सुहावनी लगी। वहां पर के पर्वत, नदी और वन को देख कर वे वहीं बैठकर तपस्या में लीन हो गये। नारद मुनि की इस तपस्या से देवराज इन्द्र भयभीत हो उठे कि कहीं देवर्षि नारद अपने तप के बल से इन्द्रपुरी को अपने अधिकार में न ले लें।

आगे की लीला में दिखाया गया कि इन्द्र ने नारद की तपस्या भंग करने के लिये कामदेव को उनके पास भेज दिया। वहां पहुंच कर कामदेव ने अपनी माया से वसन्त ऋतु को उत्पन्न कर दिया। रम्भा आदि नवयुवती अप्सराएं नृत्य व गान करने लगीं। कामदेव की किसी भी कला का नारद मुनि पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा। तब कामदेव को भय सताने लगा कि कहीं देवर्षि मुझे श्राप न दे दें। हारकर वे देवर्षि के चरणों में गिर कर क्षमा मांगने लगे। नारद मुनि को थोड़ा भी क्रोध नहीं आया और उन्होंने कामदेव को क्षमा कर दिया।

हिन्दुस्थान समाचार / ईश्वर

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