नेटिजन बनने से पहले सिटिजन बनें युवा : प्रो. संजय द्विवेदी

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नेटिजन बनने से पहले सिटिजन बनें युवा : प्रो. संजय द्विवेदी


नई दिल्ली, 07 सितंबर (हि.स.)। भारतीय जन संचार संस्थान के पूर्व महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने युवाओं से डिजिटल माध्यमों का विवेकपूर्ण उपयोग करने की अपील करते हुए कहा कि नेटिजन बनने से पहले सिटिजन बनना जरूरी है। डिजिटल मीडिया उपयोगी साधन है, लेकिन इसे जीवन का विकल्प नहीं बनने देना चाहिए। युवाओं को तकनीक का उपयोग ज्ञान-सृजन, शिक्षा, संवाद, रोजगार और नए अवसरों के विस्तार के लिए करना चाहिए।

प्रो. संजय द्विवेदी ने सोमवार को साहित्य, कला और संस्कृति के संवर्धन के लिए गठित संस्था ‘साहित्यायन’ की प्रथम व्याख्यानमाला को ऑनलाइन संबोधित करते हुए कहा। ‘डिजिटल मीडिया और युवा जीवन-दृष्टि’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि वर्तमान समय वर्नाकुलर, वॉइस और वीडियो का है। डिजिटल क्रांति ने भारतीय भाषाओं के सामने अभूतपूर्व संभावनाएं पैदा की हैं। डिजिटल माध्यमों ने भाषा और लिपि की अनेक बाधाओं को दूर किया है और भारतीय भाषाओं के साहित्य, सिनेमा, रंगमंच, कला तथा सांस्कृतिक ज्ञान को वैश्विक मंच उपलब्ध कराया है।

उन्होंने कहा कि डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध हर वायरल सूचना सत्य नहीं होती। किसी संदेश, समाचार या वीडियो को साझा करने से पहले उसके स्रोत, संदर्भ और विश्वसनीयता की जांच आवश्यक है। युवाओं को केवल डिजिटल उपभोक्ता बनने के बजाय जिम्मेदार डिजिटल नागरिक बनना चाहिए। उन्होंने मीडिया साक्षरता की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा, “बुरा मत टाइप करो, बुरा मत लाइक करो और बुरा मत शेयर करो।” उन्होंने कहा कि बिना सत्यापन के सामग्री प्रसारित करना व्यक्ति और समाज दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

प्रो. द्विवेदी ने कहा कि सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। असहमति व्यक्त करना नागरिक का अधिकार है, लेकिन अपमान, घृणा, उत्पीड़न और भ्रामक सूचना का प्रसार उचित डिजिटल व्यवहार नहीं है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की संभावनाओं और चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि एआई ने शिक्षा, अनुवाद, भाषा-परिष्कार, कंटेंट निर्माण, वॉइस रिकॉग्निशन, विज्ञापन और संचार के क्षेत्र में नए अवसर उपलब्ध कराए हैं। वहीं, मनुष्य की मौलिकता, आलोचनात्मक चिंतन और रचनात्मक श्रम के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी हुई हैं। मशीन पर अत्यधिक निर्भरता मनुष्य की चिंतन क्षमता को कमजोर कर सकती है। युवाओं को तकनीक का स्वामी बनना चाहिए, उसका गुलाम नहीं।

उन्होंने डीपफेक और कृत्रिम रूप से निर्मित सामग्री के खतरों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि एआई के दौर में सूचना के सत्यापन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। किसी व्यक्ति की आवाज, तस्वीर या वीडियो को कृत्रिम रूप से बदलकर समाज को भ्रमित किया जा सकता है। इसलिए विद्यालय से लेकर उच्च शिक्षा तक मीडिया एवं सूचना साक्षरता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि श्रेष्ठ तकनीक, भाषा और उपकरण उपलब्ध होने के बावजूद रचना तब तक प्रभावशाली नहीं बन सकती, जब तक उसमें मनुष्य के दुख, संघर्ष और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति न हो। उन्होंने बहुभाषिकता को भारत की सांस्कृतिक शक्ति बताते हुए कहा कि यह देश की कमजोरी नहीं बल्कि गौरव है।

कार्यक्रम के आरंभ में पीजीडीएवी कॉलेज (सांध्य), दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. तथा ‘साहित्यायन’ के संरक्षक हरीश अरोड़ा ने कहा कि ‘साहित्यायन’ का उद्देश्य केवल साहित्य और भाषा तक सीमित नहीं है। उन्होंने बताया कि संस्था ऑनलाइन कार्यक्रमों के साथ भविष्य में प्रत्यक्ष कार्यक्रमों का भी आयोजन करेगी।

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हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी

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