विश्व पुस्तक मेला: सातवें दिन राजकमल स्टॉल पर कई पुस्तकों का हुआ लोकार्पण
नई दिल्ली, 16 जनवरी (हि.स.)। विश्व पुस्तक मेले के सातवें दिन राजकमल प्रकाशन समूह के स्टॉल पर आयोजित साहित्यिक कार्यक्रमों में कई नई पुस्तकों का लोकार्पण हुआ और ‘लेखक से मिलिए’ सत्र में वरिष्ठ रचनाकारों के साहित्य पर चर्चा की गई। कार्यक्रम में चंदन पाण्डेय के कहानी-संग्रह भूलना, वंदना मिश्र की पुस्तक महिला क्रिकेट की कहानी, सोनी पांडेय का उपन्यास बंसवा फूले उजियार, वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन की किताबें यह जो बिहार है और हमर चम्पारण तथा कथाकार कविता का कहानी-संग्रह वो रैन लिली खिलने के दिन थे पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किए गए।
कार्यक्रम की शुरुआत प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव और प्रोफ़ेसर राजेंद्र कुमार को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ हुई। इस अवसर पर राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने कहा कि हिंदी साहित्य ने दो महत्वपूर्ण आलोचकों को खो दिया है। उन्होंने प्रोफ़ेसर राजेंद्र कुमार को अध्यापकों की उस पीढ़ी का प्रतिनिधि बताया, जिन्होंने पाठकों और लेखकों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की। वहीं वीरेंद्र यादव के साथ राजकमल का पुराना संबंध रहा है। कथाकार संजीव ने दोनों साहित्यकारों के निधन को व्यक्तिगत क्षति बताते हुए कहा कि उनसे सीखने और साथ होने का भाव मिलता था।
‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम के पहले सत्र में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कथाकार संजीव के समग्र साहित्य पर चर्चा हुई। इस दौरान उन्होंने आत्मकथा लिखने की घोषणा करते हुए बताया कि अक्षांश-देशांतर नाम से यह पुस्तक संभवतः इसी वर्ष प्रकाशित होगी। उन्होंने कहा कि इसमें जीवन के संघर्षों, आकांक्षाओं और कमियों को दर्ज किया गया है। चर्चा में उनके उपन्यास फांस के संदर्भ में किसानों की समस्याओं और आत्महत्याओं के कारणों पर भी बात हुई।
दूसरे सत्र में रामस्वरूप किसान के कविता-संग्रह फ़िज़ा के समन्दर में पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि इस संग्रह की कविताएं ग्रामीण जीवन, आमजन की पीड़ाओं और स्त्री-विमर्श को मुखर रूप में प्रस्तुत करती हैं। इस अवसर पर कवि ने अपनी कुछ रचनाओं का पाठ भी किया।
तीसरे सत्र में चंदन पाण्डेय के कहानी-संग्रह भूलना का लोकार्पण हुआ। लेखक ने कहा कि यह संग्रह समय की विसंगतियों और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण को दर्ज करता है। उन्होंने इसे व्यक्तिगत नहीं बल्कि समय की खोज बताया और संग्रह से एक कहानी का अंश भी पढ़ा।
चौथे सत्र में वंदना मिश्र की पुस्तक महिला क्रिकेट की कहानी का लोकार्पण किया गया। उन्होंने कहा कि यह किताब भारतीय और वैश्विक महिला क्रिकेट के इतिहास, उपलब्धियों और चुनौतियों को सामने लाती है। उन्होंने महिला क्रिकेट को लेकर मौजूद भेदभाव की प्रवृत्ति पर भी बात की और कहा कि नई पीढ़ी की खिलाड़ियों के लिए महिला क्रिकेटरों ने रास्ता स्थापित कर दिया है।
अगले सत्र में सोनी पांडेय के उपन्यास बंसवा फूले उजियार का लोकार्पण हुआ। लेखिका ने बताया कि यह उपन्यास ग्रामीण और कस्बाई समाज में स्त्रियों के संघर्ष और चेतना को केंद्र में रखता है। उन्होंने कहा कि लोकगीत से प्रेरित शीर्षक स्त्रियों के सवालों और प्रतिरोध का प्रतीक है।
छठे सत्र में अरविन्द मोहन की किताबें यह जो बिहार है और हमर चम्पारण प्रस्तुत की गईं। उन्होंने कहा कि इन पुस्तकों में बिहार और चंपारण के इतिहास, संस्कृति और सामाजिक यथार्थ को दर्ज किया गया है। चंपारण के महत्व पर बोलते हुए उन्होंने वहां की सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख किया।
अंतिम सत्र में कथाकार कविता के कहानी-संग्रह वो रैन लिली खिलने के दिन थे का लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया, वंदना राग और मनोज कुमार पाण्डेय उपस्थित रहे। कविता ने कहा कि यह संग्रह स्त्री के भीतरी संसार, स्मृति और संघर्ष को केंद्र में रखता है तथा समानता आधारित समाज की कल्पना करता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी

