बिहार संग्रहालय में कला एवं संस्कृति के संरक्षण में संग्रहालयों की भूमिका पर संगोष्ठी आयोजित

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बिहार संग्रहालय में कला एवं संस्कृति के संरक्षण में संग्रहालयों की भूमिका पर संगोष्ठी आयोजित


बिहार संग्रहालय में कला एवं संस्कृति के संरक्षण में संग्रहालयों की भूमिका पर संगोष्ठी आयोजित


नई दिल्ली/पटना, 28 फरवरी (हि.स)। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पुण्यतिथि के अवसर पर शनिवार को “कला एवं संस्कृति के संरक्षण में संग्रहालयों की भूमिका” विषय पर एक विचारोत्तेजक संगोष्ठी का आयोजन बिहार संग्रहालय में किया गया।

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता बिहार संग्रहालय के अपर निदेशक अशोक कुमार सिन्हा ने की। अपने संबोधन में सिन्हा ने डॉ राजेंद्र प्रसाद की अमर विरासत पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वर्ष 1917 में स्थापित बिहार संग्रहालय में महान राजनेता के दुर्लभ चित्रों और कृतियों को समर्पित एक विशेष दीर्घा का विकास कार्य प्रगति पर है। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास ऐतिहासिक चेतना को सुदृढ़ करते हैं तथा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए प्रेरित करते हैं।

इस अवसर पर प्रख्यात लेखक एवं ब्रिटिश लिंगुआ के संस्थापक डॉ बीरबल झा ने अपने प्रेरणादायक वक्तव्य में संग्रहालयों की कालजयी प्रासंगिकता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “संग्रहालय इन धरोहरों को समय की क्षति से सुरक्षित रखते हैं। वे सुनिश्चित करते हैं कि संस्कृति की ज्योति कभी बुझने न पाए। वे हमें स्मरण कराते हैं कि सभ्यता एक दिन में निर्मित नहीं होती; उसे सदियों में गढ़ा जाता है।”

संग्रहालयों को “सांस्कृतिक दूत” बताते हुए डॉ. झा ने कहा, “वे विश्व से यह उद्घोष करते हैं, यह हमारी पहचान है, उन्होंने कहा कि यह हमारी ज्ञान-परंपरा की गहराई है।” डॉ. बीरबल झा ने अपने वक्तव्य में 5वीं शताब्दी के राजा एवं कवि भर्तृहरि की रचित अमर कृति नीति शतकम से उद्धरण प्रस्तुत किया, “जिस मनुष्य में साहित्य, संगीत और कला का अभाव है, वह केवल पूँछ और सींग के बिना पशु के समान है। यह वास्तविक पशुओं का सौभाग्य है कि ऐसा मनुष्य घास नहीं खाता, फिर भी जीवित रहता है।” डॉ. झा ने इस गहन उद्धरण के माध्यम से मानव चरित्र के परिष्कार और सभ्यता के संरक्षण में कला एवं संस्कृति की अनिवार्य भूमिका को पुनः रेखांकित किया।

वहीं, इस अवसर पर उपर निदेशक डॉ सुनील कुमार झा, रणवीर सिंह राजपूत, डॉ शंकर जय किशन, डॉ विशी उपाध्याय, स्वाति कुमारी सिंह, नंदन कुमार, घनश्याम सिंह, पशुपति कुमार सिंह, मिस अदीवा, सुराज सावंत तथा रंजीत कुमार सहित अनेक वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए। सभी वक्ताओं ने संग्रहालयों को विरासत के भंडार, शिक्षा के केंद्र तथा अतीत, वर्तमान और भविष्य के मध्य सेतु के रूप में रेखांकित किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रजेश शंकर

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