साहित्य अकादेमी की प्रकाशित निर्मल वर्मा रचना-संचयन का लोकार्पण
नई दिल्ली, 14 जनवरी (हि.स.)। विश्व पुस्तक मेला में बुधवार को साहित्य अकादेमी की प्रकाशित निर्मल वर्मा रचना-संचयन (संपादक-रामवचन राय) का लोकार्पण पूर्व केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने किया।
इस अवसर पर पूर्व राजनयिक एवं ओड़िया-अंग्रेजी के प्रख्यात लेखक अमरेंद्र खटुआ भी उपस्थित रहे। इसके अतिरिक्त अकादेमी द्वारा आज लेखक मंच पर ’युवा साहिती: बहुभाषी कहानी-पाठ’ और ‘अनुवाद पर पैनल चर्चा‘ आयोजित की गई। ‘युवा साहिती: बहुभाषी कहानी-पाठ’ कार्यक्रम की अध्यक्षता ओड़िआ के प्रख्यात लेखक अमरेंद्र खटुआ ने की तथा एनी राय (ओड़िआ), युवराज भट्टराई (संस्कृत) और दत्तैयह अट्टम (तेलुगु) ने कहानी-पाठ किया। ‘अनुवाद पर पैनल चर्चा‘ में वक्ता के रूप में राजस्थानी लेखक दिनेश चारण, सिंधी लेखक मोहन हिमथाणी और तमिळ के प्रख्यात लेखक आर. थामोथरन शामिल हुए।
बहुभाषी कहानी पाठ में ओड़िया की प्रख्यात अनुवादक एनी राय ने ‘संन्यासी‘ कहानी का पाठ किया। यह कहानी एक सन्यासी के जीवन पर आधारित थी, जो अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़कर बार-बार आश्रम चला जाता है और अंत में यह कहकर संन्यास ले लेता है कि बच्चों को ईश्वर ने भेजा है और वही पाल लेगा।
युवराज भट्टराई ने ‘तस्य परिचयः’ कहानी प्रस्तुत की। यह कहानी ऐसे व्यक्ति की है, जो प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए एक प्रतिष्ठित समाजसेवी की मृत्यु पर अपना नाम भुनाने के लिए वहाँ स्थानीय नेता को बुला लेता है।
तेलुगु के लेखक दत्तैयह अट्टम ने ‘कापरी‘ कहानी का पाठ किया। यह कहानी एक चरवाहा बच्चे बालमल्लु के कठिन जीवन पर आधारित थी।
इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए अमरेंद्र खटुआ ने कहा कि कोविड के दौरान पुस्तकों का प्रकाशन 25 प्रतिशत और पाठन 35 प्रतिशत कम हुआ है, लेकिन 2024 के बाद कई बेहतरीन पुस्तकें प्रकाशित हुईं। उन्होंने कई युवा लेखकों के नाम का उल्लेख करते हुए कहा कि इनकी किताबें पठनीय हैं और यह भरोसा दिलाती है कि अभी भी बेहतर लिखा जा रहा है।
‘अनुवाद पर पैनल चर्चा’ की अध्यक्षता करते हुए सिंधी परामर्श मंडल के संयोजक मोहन हिमथाणी ने कहा कि अनुवाद के जरिये ही हम भारत जैसे देश में अंतरसंवाद कर सकते हैं। हर भाषा का अपना व्याकरण, संस्कार और अपनी संस्कृति होती है, मौलिक भाषा को यदि हम अच्छी तरह से नहीं जानते हैं तो रचना का मूल भाव अनुवाद में नहीं आ पाता है।
राजस्थानी के लेखक दिनेश चारण ने कहा कि अनुवाद की मूलभूत जरूरत है दोनों परस्पर भाषाओं का अच्छा ज्ञान। किसी अन्य भाषा से अनुवाद करने पर उसकी मौलिकता चली जाती है। उन्होंने रवीन्द्रनाथ ठाकुर, विजयदान देथा, गिरीश कर्नाड जैसे प्रसिद्ध लेखकों की रचनाओं का भी उल्लेख किया जो कई भाषाओं में अनुवाद होने के बाद भी अपने मौलिक रूप में विद्यमान हैं। प्रख्यात तमिळ लेखक आर. थामोथरन ने अनुवाद में संपादन प्रक्रिया की भूमिका पर बात करते हुए कहा कि अच्छे अनुवाद के क्षेत्र में कॉपी एडिटर की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी

