डीयू में “एप्लीकेशन ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन हेल्थ साइंसेज” ऑनलाइन सर्टिफिकेट कोर्स का शुभारंभ

WhatsApp Channel Join Now
डीयू में “एप्लीकेशन ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन हेल्थ साइंसेज” ऑनलाइन सर्टिफिकेट कोर्स का शुभारंभ


नई दिल्ली, 04 फ़रवरी (हि.स.)। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने बुधवार को चिकित्सा क्षेत्र में एआई के बढ़ते प्रभाव को लेकर “एप्लीकेशन ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन हेल्थ साइंसेज” नाम से ऑनलाइन सर्टिफिकेट कोर्स का शुभारंभ किया।

इस अवसर पर कुलपति ने अपने संबोधन में कहा कि भविष्य में टेक्नोलोजी ओरिएंटेड़ डॉक्टरों की जरूरत है, इसलिए ऐसे कोर्स होने चाहिए। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन के साथ-साथ ऐसे वीकेंड ऑफ लाइन कोर्स भी शुरू किए जाने चाहियें।

कुलपति ने कहा कि जैसे कंप्यूटर आने पर लोगों को काम छीनने की चिंता हुई थी, वैसे ही एआई को लेकर कुछ लोग चिंता करते हैं कि यह रोजगार छीन लेगा। लेकिन डरने की जरूरत नहीं है, इसके साथ बहुत से रोजगार विकसित होंगे, पूरी तरह से एआई पर निर्भर नहीं हो सकते। मानवीय कार्यों को पूरी तरह से हटाया नहीं जा सकता।

प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि मशीन में समझ तो आ सकती है, लेकिन बुद्धि नहीं इसीलिए सभी कार्य मशीन आधारित नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि समझ की समझ को विकसित करना ही शिक्षा है।

इस अवसर पर डीन ऑफ कॉलेजेज प्रो. बलराम पाणी, डीन अकादमिक प्रो. के. रत्नाबली, डीयू की रिसर्च, इनोवेशन और एंटरप्रेन्योरशिप काउंसिल के चेयरपर्सन प्रो. दिनाबंधु साहू, कोर्स डायरेक्टर प्रो. दमन सलूजा, कोर्स जॉइंट डायरेक्टर प्रो. नवीन कुमार और कोर्स कोऑर्डिनेटर डॉ. अंकित राजपाल सहित कई लोग उपस्थित रहे।

उल्लेखनीय है कि डीयू की रिसर्च, इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप काउंसिल के तत्वावधान में चलाया जाने वाला यह कोर्स आठ मॉड्यूल में होगा। यह कोर्स सौ प्रतिशत ऑनलाइन मोड में होगा, जिसकी अवधि 15 सप्ताह (शनिवार और रविवार, हर दिन 2 घंटे) होगी। कोर्स में प्रति बैच 50 सीटें रखी गई हैं। कोर्स के लिए अनिवार्य योग्यता सीएस, आईटी, इंजीनियरिंग, गणित, सांख्यिकी या लाइफ साइंसेज एवं हेल्थकेयर (एमबीबीएस, नर्सिंग, फार्मेसी) में बैचलर है। इस कोर्स का प्राथमिक उद्देश्य स्वास्थ्य विज्ञान में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के अनुप्रयोगों में व्यापक आधार प्रदान करना है, जिससे प्रतिभागियों को मेडिकल एआई सिस्टम को डिजाइन करने, मूल्यांकन करने और व्याख्या करने में सक्षम बनाया जा सके और इसके साथ ही इंटरडिसिप्लिनरी समस्या-समाधान, नैतिक जागरूकता और अनुवाद संबंधी प्रभाव को बढ़ावा दिया जा सके।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी

Share this story