भाषा राष्ट्र की आत्मा और साहित्य उसके मूल्यों को स्थायी बनाता है : विजेंद्र गुप्ता

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भाषा राष्ट्र की आत्मा और साहित्य उसके मूल्यों को स्थायी बनाता है : विजेंद्र गुप्ता




नई दिल्ली, 29 अक्टूबर (हि.स.)। दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि भाषा राष्ट्र की आत्मा है और साहित्य उसके विचारों एवं मूल्यों को स्थायी बनाता है। किसी देश की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत से निर्मित होती है। यह बात विजेंद्र गुप्ता ने गुरुवार को दिल्ली विश्वविद्यालय में दो दिवसीय ‘रचयिता साहित्य उत्सव’ के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कही।

‘भाषा, साहित्य और देश’ विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि भाषा, साहित्य और राष्ट्रीय पहचान एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। भारत की सभ्यतागत विरासत को सुरक्षित रखने के लिए अपनी भाषाई विरासत का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।

विजेंद्र गुप्ता ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है बल्कि यह किसी समाज की चेतना, भावनाओं, परंपराओं और सामूहिक स्मृतियों को भी अभिव्यक्त करती है। कबीर, सूरदास, मीराबाई और तुलसीदास जैसे साहित्यकारों के योगदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की साहित्यिक परंपराओं ने क्षेत्रीय भाषाओं को समृद्ध करने के साथ-साथ देश को एक साझा सांस्कृतिक सूत्र में पिरोने का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि साहित्य भौगोलिक और सामाजिक सीमाओं से परे जाकर सामूहिक ज्ञान को संरक्षित करता है तथा पीढ़ियों के सुख-दुःख, संघर्षों और आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति प्रदान करता है।

भाषा और साहित्य के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि किसी राष्ट्र की सभ्यता को कमजोर करने के प्रयास अक्सर उसकी भाषाई और साहित्यिक परंपराओं पर प्रहार से शुरू होते हैं। भारत में विदेशी शासन के अनुभवों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि लंबे राजनीतिक पराधीनता के दौर में भी भारतीय भाषाओं और साहित्यिक कृतियों ने देश की सांस्कृतिक चेतना को जीवित बनाए रखा। उन्होंने जापान, जर्मनी, फ्रांस और इजरायल के उदाहरण देते हुए कहा कि भाषा और साहित्य राष्ट्रीय पहचान को सशक्त बनाने, सांस्कृतिक आत्मविश्वास को पुनर्जीवित करने तथा किसी राष्ट्र के बौद्धिक एवं सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विजेंद्र गुप्ता ने भारतेंदु हरिश्चंद्र और महात्मा गांधी के विचारों का उल्लेख करते हुए राष्ट्रीय जागरण और शिक्षा में भारतीय भाषाओं के महत्व पर प्रकाश डाला। मातृभाषा में शिक्षा के संबंध में गांधीजी के विचारों का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि बच्चे अपनी भाषा में पढ़ाए जाने पर विषयों को अधिक प्रभावी ढंग से सीखते और समझते हैं। उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और सुब्रमण्यम भारती के योगदान को भी रेखांकित किया, जिनकी साहित्यिक रचनाओं ने राष्ट्रीय चेतना को जागृत किया और स्वतंत्रता आंदोलन की भावना को मजबूत बनाया। उन्होंने कहा कि भाषाई विविधता हमारी शक्ति है और अन्य भाषाओं को सीखने के महत्व को कम किए बिना भारतीय भाषाओं को उचित सम्मान एवं प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।

वर्तमान भारत में भाषा और साहित्य की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने शिक्षा, शोध और सार्वजनिक प्रशासन में इनके महत्व को रेखांकित किया। दिल्ली विधानसभा में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के प्रयासों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विधानसभा के आधिकारिक कामकाज, पत्राचार और अन्य गतिविधियों में हिंदी के उपयोग का विस्तार किया जा रहा है। उन्होंने भारत सरकार के ‘भाषिणी’ मंच की संभावनाओं पर भी चर्चा की, जो अनुवाद और आवाज-आधारित तकनीकों के माध्यम से भाषाई बाधाओं को दूर करने तथा विभिन्न भारतीय भाषाओं में संवाद एवं सूचना तक पहुंच को सुगम बनाने में सहायक है। उन्होंने युवाओं से अपनी मातृभाषा में पढ़ने, लिखने और सृजन करने का आह्वान करते हुए कहा कि साहित्य का प्रत्येक योगदान राष्ट्र की सांस्कृतिक नींव को मजबूत बनाता है।

विजेंद्र गुप्ता ने युवा शोधार्थियों, लेखकों और विद्यार्थियों को भारत की समृद्ध साहित्यिक विरासत से जोड़ने के लिए ‘रचयिता साहित्य उत्सव’ की सराहना की। उन्होंने चर्चा-सत्रों, काव्य-पाठ, संगोष्ठियों और रचनात्मक प्रतियोगिताओं के माध्यम से साहित्यिक संवाद को प्रोत्साहित करने के प्रयासों की प्रशंसा की तथा आयोजनकर्ताओं और रचयिता संस्था के प्रति आभार व्यक्त किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / धीरेन्द्र यादव

Livevns.news Desk
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