खस की पहली फसल से महिला समूह ने कमाए 1.12 लाख रुपये
धमतरी, 29 सितंबर (हि.स.)। पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर नवाचार और सामूहिक प्रयास के जरिए ग्रामीण महिलाएं अब अपनी आजीविका को नई दिशा दे रही हैं। सेवा संकल्प अभियान के तहत धमतरी जिले के कुरुद विकासखंड के ग्राम पंचायत परखंदा में ‘धान के कटोरा उत्पादक समिति’ स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने औषधीय एवं सुगंधित फसल खस की खेती कर सफलता की नई मिसाल कायम की है।
समूह की महिलाओं ने 2.50 एकड़ क्षेत्र में खस की खेती की और पहली ही फसल में 11.20 क्विंटल उत्पादन प्राप्त कर 1 लाख 12 हजार रुपये की आय अर्जित की।
यह उपलब्धि महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के साथ-साथ कृषि विविधीकरण और सामूहिक आजीविका की संभावनाओं को भी सामने लाती है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका के बीच आय के नए स्रोत विकसित करने की जरूरत को देखते हुए परखंदा की महिलाओं ने पारंपरिक फसलों के साथ औषधीय एवं सुगंधित फसलों की खेती का प्रयोग शुरू किया। खस की खेती उनके लिए नया अनुभव था और उत्पादन से लेकर फसल प्रबंधन तक कई चुनौतियां सामने आईं, लेकिन सामूहिक श्रम, नियमित देखभाल और सीखने की ललक ने इन चुनौतियों को अवसर में बदल दिया। पहली फसल की कटाई के बाद जब 11.20 क्विंटल खस का उत्पादन प्राप्त हुआ और इसके विक्रय से समूह को 1 लाख 12 हजार रुपये की आय हुई, तो महिलाओं का उत्साह और आत्मविश्वास दोनों बढ़े।
समूह की सफलता की खास बात यह है कि स्व-सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं अब केवल बचत और ऋण की गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उत्पादन, फसल प्रबंधन और विपणन जैसी आर्थिक गतिविधियों में भी सामूहिक रूप से भागीदारी निभा रही हैं। खस की खेती से मिली आय ने उन्हें यह भरोसा दिया है कि उपलब्ध भूमि और स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग कर कृषि आधारित आजीविका को नई दिशा दी जा सकती है। इसी क्रम में ग्राम पंचायत परखंदा में योजनांतर्गत 6 एकड़ क्षेत्र में मिश्रित वृक्षारोपण भी किया गया है।
औषधीय खेती और मिश्रित वृक्षारोपण को साथ लेकर चलने से इस पहल का दायरा और व्यापक हो गया है, जहां एक ओर वृक्षारोपण पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे रहा है, वहीं दूसरी ओर औषधीय फसलों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं के लिए आय के नए अवसर तैयार हो रहे हैं। पहली फसल से मिले उत्साहजनक परिणाम के बाद समूह ने अपनी गतिविधियों का विस्तार करते हुए खस के साथ हल्दी की खेती भी शुरू की है।
परखंदा की महिलाओं की यह पहल केवल 11.20 क्विंटल खस उत्पादन और 1.12 लाख रुपये की आय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण महिलाओं के लाभार्थी से आगे बढ़कर आजीविका गतिविधियों की संचालक बनने की कहानी है। खस की खेती से शुरू हुआ यह प्रयोग अब महिलाओं के लिए आत्मविश्वास, सामूहिकता और आर्थिक संभावनाओं का माध्यम बन रहा है। खेती में नवाचार, उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग, महिला समूह की सामूहिक भागीदारी और पर्यावरण संरक्षण का समन्वय परखंदा को ग्रामीण आजीविका के एक प्रेरक मॉडल के रूप में पहचान दे रहा है।
हिन्दुस्थान समाचार / रोशन सिन्हा

