बस्तर दशहरा के पदाधिकारियों को मिले वस्त्र, विधायक उसेंडी बोलीं-पांच करोड़ से बनेगा आदिवासी संग्रहालय

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बस्तर दशहरा के पदाधिकारियों को मिले वस्त्र, विधायक उसेंडी बोलीं-पांच करोड़ से बनेगा आदिवासी संग्रहालय


कोंडागांव, 19 अक्टूबर (हि.स.)। जिला कार्यालय के सभाकक्ष में हुए कार्यक्रम में मांझी-चालकी, गायता-पुजारी, मेंबर-मेम्बरीन और पटेल को आज साेमवार काे बस्तर दशहरा के लिए पारंपरिक परिधान दिए गए। बस्तर विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष और कोंडागांव विधायक लता उसेंडी, कलेक्टर नूपुर राशि पन्ना और नगर पालिका अध्यक्ष नरपति पटेल ने वस्त्र का वितरण किया। इस दौरान आदिवासी संस्कृति और रीति-रिवाजों को सहेजने पर जोर दिया गया।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विधायक लता उसेंडी ने कहा कि बस्तर दशहरा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि बस्तर की सदियों पुरानी परंपराओं और समृद्ध आदिवासी संस्कृति का प्रतीक है। यह पर्व लोगों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ता है और बस्तर की अलग पहचान को सामने लाता है। उन्होंने कहा कि समय के साथ बदलाव होना स्वाभाविक है, लेकिन इस दौरान अपनी संस्कृति और परंपराओं को भूलना नहीं चाहिए। इन्हें सहेजकर रखना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है। इसी दिशा में कोंडागांव में 05 करोड़ रुपए की लागत से आदिवासी संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए संग्रहालय बनाया जाएगा।

विधायक उसेंडी ने कहा कि आदिवासी संस्कृति संग्रहालय बनने से समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। इसके जरिए नई पीढ़ी को आदिवासी समाज के पारंपरिक रीति-रिवाजों, रहन-सहन और सांस्कृतिक पहचान को जानने-समझने का मौका मिलेगा। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़कर रखना जरूरी है। संग्रहालय के माध्यम से बच्चों और युवाओं को अपनी संस्कृति के बारे में जानकारी मिल सकेगी। इससे वे अपनी परंपराओं को समझेंगे और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित होंगे।

विधायक लता उसेंडी ने बस्तर दशहरा में शामिल होने वाले सभी पारंपरिक पदाधिकारियों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि मांझी-चालकी, गायता-पुजारी, मेंबर-मेम्बरीन और पटेल जैसे पारंपरिक पदाधिकारी बस्तर की सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने सभी से अपील की कि वे अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों को आगे बढ़ाने के साथ नई पीढ़ी को भी इनसे परिचित कराएं। सांस्कृतिक विरासत केवल बीते समय की पहचान नहीं है, बल्कि यह समाज की पहचान और आपसी जुड़ाव का भी आधार है। इसे सुरक्षित रखना और आगे बढ़ाना आओ गाली पीढ़ियों के लिए बेहद जरूरी है।

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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे

Livevns.news Desk
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