युवावस्था से ही करना चाहिए भजन, सत्संग और सद्कर्मों की शुरुआत: संत लोकेश
धमतरी, 20 जून (हि.स.)। आचार्य सद्गुरु स्वामी टेऊंराम महाराज के 140वें जन्मोत्सव चालीहा पर्व के 10वें दिन स्वामी टेऊंराम आश्रम अठवानी गली में शनिशार काे आयोजित सत्संग कार्यक्रम में मानव जीवन की महत्ता, समय के सदुपयोग और भजन-साधना के महत्व पर विशेष प्रकाश डाला गया।
सत्संग में संत लोकेश ने कहा कि युवावस्था में ही भजन, सत्संग और सद्कर्मों की शुरुआत करनी चाहिए, क्योंकि वृद्धावस्था में शरीर और इंद्रियों की दुर्बलता साधना के मार्ग में बाधा बन सकती है। प्रकृति के सभी कार्य समयानुसार होते हैं, इसलिए मनुष्य को भी वर्तमान हर क्षण का सदुपयोग करते हुए राग-द्वेष से मुक्त होकर पावन कर्मों में लगना चाहिए। मनुष्य जीवन प्रभु की कृपा और संचित पुण्यों का परिणाम है। यह आत्मज्ञान, परोपकार और प्रभु भक्ति के लिए मिला एक दुर्लभ अवसर है, जिसे माया-मोह में फंसकर व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। महाभारत के प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया गया कि अर्जुन ने भगवान कृष्ण का चयन कर आध्यात्मिक मार्ग अपनाया, जबकि दुर्योधन ने नारायणी सेना मांगकर सांसारिक मोह को प्राथमिकता दी। कार्यक्रम में आचार्य टेऊंराम जी द्वारा रचित प्रसिद्ध भजन का भावपूर्ण गायन किया गया। सत्संग में समय के महत्व पर विशेष जोर देते हुए बताया गया कि जीवन का वास्तविक हित इसी में है कि मनुष्य अपने दुर्लभ मानव जन्म को भक्ति, सेवा और आत्म कल्याण के मार्ग पर चलकर सार्थक बनाए। गुरुभक्त प्रहलाद आहूजा एवं नीरज आहूजा परिवार द्वारा आयोजित कार्यक्रम में श्री प्रेम प्रकाश ग्रंथ की विस्तार से व्याख्या की गई। कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं ने भजन, सत्संग और आध्यात्मिक चिंतन के माध्यम से मानव जीवन को सफल बनाने का संकल्प लिया।
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हिन्दुस्थान समाचार / रोशन सिन्हा

