तालाब की अजोला बनी आदिवासी महिलाओं की ताकत, प्राकृतिक खेती और आजीविका का नया आधार

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तालाब की अजोला बनी आदिवासी महिलाओं की ताकत, प्राकृतिक खेती और आजीविका का नया आधार


धमतरी, 27 जुलाई (हि.स.)। तालाबों और जलाशयों में उगने वाली अजोला को कभी साधारण जलीय वनस्पति समझकर नजरअंदाज किया जाता था, लेकिन धमतरी जिले के नगरी विकासखंड की ग्राम पंचायत अमाली की आदिवासी बिहान स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने इसे अपनी आजीविका, प्राकृतिक खेती और आत्मनिर्भरता का मजबूत माध्यम बना दिया है।

वैज्ञानिक प्रशिक्षण, सामूहिक प्रयास और नवाचार की सोच ने इस पहल को जिले के लिए प्रेरणादायी मॉडल बना दिया है। कृषि सखी अनिता बाई मरकाम ने प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद अपने घर में छोटे-छोटे टैंकों में अजोला का उत्पादन शुरू किया। पशु चिकित्सा विभाग से अजोला कल्चर मिलने के बाद उन्होंने वैज्ञानिक तरीके से इसकी देखभाल की और अब लगभग 25 किलोग्राम अजोला तैयार कर चुकी हैं। उनका लक्ष्य आने वाले समय में उत्पादन बढ़ाकर अधिक किसानों और पशुपालकों तक इसका लाभ पहुंचाना है। समूह द्वारा तैयार अजोला का उपयोग धान की खेती में जैविक पूरक के रूप में किया जा रहा है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ रही है, नमी का संरक्षण हो रहा है और फसलों को आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व मिल रहे हैं। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घट रही है और प्राकृतिक खेती को नई मजबूती मिल रही है।

अजोला का उपयोग पशुपालन, मत्स्य पालन और कुक्कुट पालन में भी पौष्टिक पूरक आहार के रूप में किया जा रहा है। इससे दूध देने वाले पशुओं का पोषण बेहतर हुआ है, मछलियों की वृद्धि में सुधार आया है और मुर्गी पालन में भी अच्छे परिणाम मिल रहे हैं। कम लागत में तैयार होने वाला यह स्थानीय संसाधन ग्रामीणों की आय बढ़ाने और उत्पादन लागत घटाने में प्रभावी साबित हो रहा है। अनिता बाई मरकाम बताती हैं कि जो अजोला कभी उनके लिए सिर्फ एक नई जानकारी था, वही आज परिवार, समूह की महिलाओं और आसपास के किसानों के लिए उपयोगी संसाधन बन गया है। समूह की महिलाएं अपने पशुओं को अजोला खिलाने के साथ-साथ खेतों में भी इसका उपयोग कर रही हैं, जिससे आर्थिक लाभ के साथ प्राकृतिक खेती अपनाने का आत्मविश्वास भी बढ़ा है।

समूह की महिलाओं का कहना है कि जिस अजोला को पहले महत्वहीन समझा जाता था, वही आज उनकी आजीविका का मजबूत आधार बन चुका है। सामूहिक प्रयास, प्रशिक्षण और वैज्ञानिक सोच ने उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया है। भविष्य में समूह जैविक खाद, वर्मी कम्पोस्ट और अन्य मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने की दिशा में भी काम करेगा। इस पहल को सफल बनाने में चेतन कुमार नेताम और तुषार यादव का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा। ग्राम पंचायत अमाली की यह पहल साबित करती है कि स्थानीय संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है।

हिन्दुस्थान समाचार / रोशन सिन्हा

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