श्रद्धा के साथ पितरों को तर्पण, पूर्वजों के सम्मान का पर्व है पितृपक्ष

WhatsApp Channel Join Now
श्रद्धा के साथ पितरों को तर्पण, पूर्वजों के सम्मान का पर्व है पितृपक्ष


धमतरी, 27 सितंबर (हि.स.)। पितृपक्ष के साथ ही शहर और आसपास के क्षेत्रों में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और स्मरण का दौर शुरू हो गया है। 26 सितंबर से प्रारंभ हुए पितृपक्ष में सुबह से ही घरों में विधि-विधान के साथ पितरों का आह्वान कर तर्पण, पूजन और भोग अर्पित किया गया। तालाबों और जलाशयों के किनारे भी लोगों ने कुश के माध्यम से पितरों को जल अर्पित कर उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

घरों में चावल के आटे से रंगोली बनाकर उस पर पीढ़ा रखा गया। इसके बाद लोटे में जल भरकर दातून रखी गई और विधि-विधान से पूर्वजों का आह्वान किया गया। पूजन के बाद विभिन्न पकवान और भोजन का भोग लगाया गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष के 15 दिन पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। मान्यता है कि इन दिनों पितर अपनी मृत्यु तिथि के अनुसार पृथ्वी पर आते हैं और परिवार के सदस्य उनके निमित्त श्राद्ध, तर्पण तथा पिंडदान करते हैं। कई परिवारों में भोग लगाने के बाद कौवे के आने की प्रतीक्षा भी की जाती है। मान्यता है कि कौवे द्वारा भोग ग्रहण करना पितरों तक अर्पण पहुंचने का संकेत माना जाता है।

पितृपूजन में तोरई के पत्ते, तोरई की सब्जी और उड़द दाल का विशेष महत्व बताया जाता है। इसके चलते पितृपक्ष शुरू होते ही बाजार में इन वस्तुओं की मांग बढ़ गई है। मांग बढ़ने के साथ तोरई की कीमत भी बढ़कर करीब 100 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। पंडित राजकुमार तिवारी ने बताया कि शास्त्रीय मान्यता के अनुसार पितृपक्ष में पितरों को श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करने से उन्हें तृप्ति प्राप्त होती है। जन्म के बाद मनुष्य पर पितृ ऋण, देव ऋण और ऋषि ऋण तीन प्रकार के ऋण माने गए हैं। इनमें पितृ ऋण की पूर्ति के लिए श्राद्ध और तर्पण की परंपरा निभाई जाती है। पितृपक्ष केवल धार्मिक अनुष्ठान का अवसर नहीं, बल्कि परिवार की नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों की स्मृतियों, संस्कारों और परंपराओं से जोड़ने का भी पर्व माना जाता है।

हिन्दुस्थान समाचार / रोशन सिन्हा

Share this story