प्रदेशभर में एक अक्टूबर से रासुका लागू करने का आदेश भाजपा का तुगलकी फरमान : सूरज कश्यप

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प्रदेशभर में एक अक्टूबर से रासुका लागू करने का आदेश भाजपा का तुगलकी फरमान : सूरज कश्यप


जगदलपुर, 25 सितंबर (हि.स.)। छत्तीसगढ़ शासन के गृह विभाग द्वारा एक अक्टूबर से 31 दिसंबर तक प्रदेश के सभी 33 जिलों के कलेक्टरों को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (रासुका/NSA) के तहत विशेष प्रशासनिक अधिकार सौंपे जाने के फैसले का कड़ा विरोध करते हुए कांग्रेस के जनपद सदस्य सूरज कश्यप ने इस आदेश को आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर कुठाराघात बताया है। इसे भाजपा सरकार की तानाशाही और तुगलकी फरमान करार दिया है।

सूरज कश्यप ने शुक्रवार काे बयान जारी कर सरकार के इस तुगलकी फरमान पर कई सवाल खड़े करते हुए कहा कि जब बस्तर का ऐतिहासिक दशहरा और दीपावली सामने है, तो जनता को रासुका का खौफ क्यों? क्या सामान्य पुलिसिंग और दंड प्रक्रिया पूरी तरह विफल हो चुकी है? क्या लोकतांत्रिक तरीके से हक मांगने वाले ग्रामीणों व युवाओं की आवाज दबाई जाएगी? बस्तर दशहरा के बीच भय का माहौल क्यों?

सूरज कश्यप ने आरोप लगाया कि कलेक्टरों को असीमित शक्तियां देकर सरकार अपनी नीतियों के खिलाफ होने वाले जायज विरोध प्रदर्शनों को कुचलना चाहती है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि शांति और सुरक्षा के नाम पर किसी भी निर्दोष नागरिक या युवा को प्रताड़ित किया गया, तो वे सड़क से लेकर सदन तक लोकतांत्रिक आंदोलन करेंगे। उन्होंने शासन से इस आदेश को तत्काल वापस लेने की मांग की है।

सूरज कश्यप ने कहा कि आने वाले दिनों में नवरात्रि, दीपावली और पूरे विश्व में प्रसिद्ध बस्तर का ऐतिहासिक दशहरा पर्व है। जब प्रदेश और बस्तर की जनता उल्लास और श्रद्धा के साथ त्योहारों की तैयारी कर रही है, ऐसे समय में सरकार नागरिकों के सिर पर रासुका की तलवार लटका रही है। उन्होंने सवाल किया कि क्या शासन को अपनी ही शांतिप्रिय जनता पर भरोसा नहीं रहा, जो सामान्य कानूनों को दरकिनार कर इतने कठोर कानून का सहारा लेना पड़ रहा है? उन्हाेने कहा कि आदिवासी और कमजोर वर्ग पर सबसे बुरा असर पड़ेगा ।

जनपद सदस्य ने चिंता जताई कि रासुका जैसे ‘निवारक निरोध’ कानून का सबसे ज्यादा दुरुपयोग जमीनी स्तर पर गरीब,अशिक्षित और अधिकारों से अनजान ग्रामीणों के खिलाफ होता है। उन्होंने पूछा कि “यदि बस्तर का कोई किसान, बेरोजगार युवा या ग्रामीण अपने जल-जंगल-जमीन या बुनियादी हकों के लिए शांतिपूर्ण आवाज उठाएगा, तो क्या स्थानीय प्रशासन उसे कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बताकर बिना सुनवाई जेल भेज देगा? क्या किसी गरीब परिवार के पास इतने संसाधन हैं कि वह रासुका जैसी लंबी और पेचीदा कानूनी प्रक्रिया का सामना कर सके?

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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे

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