नैनो तकनीक से सरगुजा के खेतों में आई खुशहाली, पारंपरिक खाद छोड़ नैनो यूरिया अपना रहे किसान

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नैनो तकनीक से सरगुजा के खेतों में आई खुशहाली, पारंपरिक खाद छोड़ नैनो यूरिया अपना रहे किसान


अंबिकापुर, 02 जून (हि.स.)। सरगुजा जिले के कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों के समावेश से एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। खेती की लागत कम करने, मिट्टी की सेहत सुधारने और पैदावार बढ़ाने के लिए अब किसान वैज्ञानिक पद्धतियों को तेजी से अपना रहे हैं।

इसी कड़ी में अंबिकापुर के देवीगंज रोड निवासी और ग्राम बरकेला के प्रगतिशील किसान शंकर लाल गुप्ता क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए एक रोल मॉडल बनकर उभरे हैं। उन्होंने पिछले वर्ष अपने खेतों में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी का सफल प्रयोग कर आधुनिक खेती की एक नई मिसाल पेश की है।

लंबे समय से पारंपरिक दानेदार यूरिया और डीएपी का उपयोग करने वाले किसान शंकर लाल गुप्ता ने बताया कि पिछले वर्ष कृषि विशेषज्ञों की सलाह पर उन्होंने पहली बार नैनो उर्वरकों का इस्तेमाल किया था। इसके परिणाम बेहद चौंकाने वाले और उत्साहजनक रहे। नैनो यूरिया और नैनो डीएपी के छिड़काव से धान की फसल न केवल अधिक स्वस्थ और हरी-भरी दिखाई दी, बल्कि उसकी वृद्धि भी सामान्य से काफी बेहतर रही, जिसका सीधा सकारात्मक असर उत्पादन पर पड़ा है।

इस आधुनिक तकनीक का सबसे बड़ा फायदा बताते हुए उन्होंने कहा कि नैनो उर्वरकों के आने से परिवहन और भंडारण की एक बड़ी समस्या का स्थायी समाधान मिल गया है। पहले उनके 65 एकड़ के विशाल कृषि रकबे के लिए ट्रैक्टरों में भरकर बड़ी मात्रा में खाद की बोरियां लानी पड़ती थीं। इसमें परिवहन, मजदूरी और भंडारण पर भारी-भरकम अतिरिक्त खर्च होता था। इसके विपरीत, अब नैनो यूरिया और नैनो डीएपी की छोटी बोतलें आसानी से हाथ में या बाइक पर रखकर भी खेत तक पहुंचाई जा सकती हैं, जिससे समय, श्रम और संसाधनों की बड़ी बचत हो रही है।

लागत के मोर्चे पर भी यह तकनीक किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी काफी किफायती हैं। इससे खेती की शुरुआती लागत में उल्लेखनीय कमी आई है और प्रति एकड़ शुद्ध मुनाफे की संभावना काफी बढ़ गई है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यह बेहद कारगर साबित हो रहा है, क्योंकि पारंपरिक खाद का एक बड़ा हिस्सा पानी के बहाव या हवा के कारण नष्ट हो जाता है, जबकि नैनो उर्वरकों का सीधे पौधों पर छिड़काव किया जाता है। इससे पत्तियों के जरिए पोषक तत्व तुरंत अवशोषित हो जाते हैं और खाद की एक-एक बूंद का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित होता है।

नैनो उर्वरकों के इन शानदार और व्यावहारिक परिणामों से उत्साहित होकर शंकर लाल गुप्ता अब क्षेत्र के दूसरे किसानों को भी इस तकनीक को अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह तकनीक न केवल जेब के अनुकूल है, बल्कि इसे लाना और खेत में इस्तेमाल करना बेहद आसान है। कम लागत में बेहतर उत्पादन का यह फॉर्मूला हर किसान की आय बढ़ाने में मददगार साबित हो सकता है।

आर्थिक लाभ के साथ-साथ यह तकनीक मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाए रखने और पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ी भूमिका निभा रही है। रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होने से खेतों की सेहत सुरक्षित रहती है। फिलहाल, जिला प्रशासन और कृषि विभाग के माध्यम से शंकर लाल गुप्ता के इस सफल अनुभव को अन्य गांवों तक पहुँचाने के प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि सरगुजा जिले के अधिक से अधिक किसान इस 'स्मार्ट कृषि' को अपनाकर आत्मनिर्भर बन सकें।

हिन्दुस्थान समाचार / पारस नाथ सिंह

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