हरेली पर्व : कृषि औजारों की होगी पूजा, बच्चे खेलेंगे गेड़ी

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हरेली पर्व : कृषि औजारों की होगी पूजा, बच्चे खेलेंगे गेड़ी


धमतरी, 11 अगस्त (हि.स.)। सावन माह की अमावस्या के अवसर पर छत्तीसगढ़ का पहला पारंपरिक पर्व हरेली बुधवार को पूरे अंचल में उत्साह और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। हरेली को हरियाली पर्व भी कहा जाता है, जो मुख्य रूप से कृषि, प्रकृति और पशुधन के प्रति आस्था एवं कृतज्ञता का प्रतीक है। पर्व के अवसर पर किसान सुबह अपने कृषि औजारों की साफ-सफाई कर उनकी विधिवत पूजा-अर्चना करेंगे और कुल देवी-देवताओं की पूजा कर सुख-समृद्धि तथा अच्छी फसल की कामना करेंग

परंपरा अनुसार पूजा में गुड़ के चीले सहित विभिन्न पारंपरिक पकवानों का भोग लगाया जाएगा। हरेली पर गौवंश को वन औषधियों के साथ गेहूं के आटे की लोंदी खिलाने की भी परंपरा है। मान्यता है कि इससे पशु स्वस्थ रहते हैं और उन्हें बीमारियों से बचाव मिलता है। किसान खेतों में नीम की टहनियां भी लगाएंगे, वहीं गांवों में बैगा घर-घर जाकर नीम की टहनियां लगाने की परंपरा निभाएंगे। शहरों में भी लोग अपने घरों के मुख्य द्वार पर नीम की टहनियां लगाकर इस परंपरा का निर्वहन करेंगे।

हरेली पर्व के दौरान बच्चे और युवा गेड़ी चढ़कर पारंपरिक खेल का आनंद लेंगे। बांस से बनी गेड़ी पर चढ़कर गांव-मोहल्लों में घूमने की परंपरा आज भी पर्व का प्रमुख आकर्षण है। हरेली उस समय मनाई जाती है, जब धान की रोपाई का कार्य चरम पर होता है और खेत हरियाली से आच्छादित हो जाते हैं। चारों ओर फैली हरियाली किसानों के मन में नई उम्मीद और उत्साह भरती है तथा वे प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करते हुए फसल की समृद्धि की कामना करते हैं। इस दिन किसान खेतों में जाकर पूजा-पाठ करते हैं और फसलों को कीट-व्याधियों से बचाने तथा अच्छी पैदावार के लिए प्रार्थना करते हैं। पशुधन के प्रति भी विशेष सम्मान प्रकट किया जाता है। गाय, बैल, भैंस सहित अन्य पालतू पशुओं को नहलाकर सजाया जाता है और प्रसाद खिलाया जाता है।

हरेली केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति, लोक परंपरा और प्रकृति संरक्षण से जुड़ी जीवंत विरासत है। गांवों और मोहल्लों में इस अवसर पर पारंपरिक खेलकूद एवं मनोरंजन के आयोजन भी होंगे। नीम की टहनियां लगाने की परंपरा जहां स्वास्थ्य और कीट नियंत्रण से जुड़ी लोकमान्यता को दर्शाती है, वहीं कृषि औजारों की पूजा मेहनतकश किसान और उसकी खेती के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है।

हिन्दुस्थान समाचार / रोशन सिन्हा

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