कोरबा में सुगंधित कालानमक धान और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की पहल, दो गांवों में शुरू हुआ प्रायोगिक उत्पादन

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कोरबा में सुगंधित कालानमक धान और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की पहल, दो गांवों में शुरू हुआ प्रायोगिक उत्पादन


कोरबा में सुगंधित कालानमक धान और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की पहल, दो गांवों में शुरू हुआ प्रायोगिक उत्पादन


कोरबा में सुगंधित कालानमक धान और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की पहल, दो गांवों में शुरू हुआ प्रायोगिक उत्पादन


कोरबा, 25 अक्टूबर (हि. स.)। जिले में प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने, कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देने और किसानों की आय में वृद्धि के उद्देश्य से कृषि विभाग के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी संजय पटेल ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। इसके तहत उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर और गोरखपुर क्षेत्र की प्रसिद्ध पारंपरिक सुगंधित धान की किस्म कालानमक को कोरबा जिले के किसानों तक पहुंचाया गया है।

इस पहल के अंतर्गत सिद्धार्थनगर स्थित पीआरडीएफ (पार्टिसिपेटरी रूरल डेवलपमेंट फाउंडेशन) संस्था के प्रमुख रामचेत चौधरी के समन्वय से कालानमक धान के बीज उपलब्ध कराए गए हैं। इसका उद्देश्य किसानों को पारंपरिक एवं उच्च गुणवत्ता वाली सुगंधित धान की खेती के लिए प्रोत्साहित करना, प्राकृतिक खेती का दायरा बढ़ाना तथा बेहतर बाजार मूल्य वाली कृषि उपज के माध्यम से उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत करना है।

भगवान बुद्ध से जुड़ी है पारंपरिक मान्यता

कालानमक धान पूर्वी उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र, विशेषकर सिद्धार्थनगर और गोरखपुर क्षेत्र की प्रसिद्ध पारंपरिक किस्म है। इसका छिलका गहरे रंग का होता है, जबकि चावल के दाने सफेद और विशिष्ट सुगंध वाले होते हैं। अपनी खास खुशबू, स्वाद और ऐतिहासिक पहचान के कारण इसे भारत की पारंपरिक धान किस्मों में विशेष स्थान प्राप्त है।

स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार, भगवान गौतम बुद्ध के इस क्षेत्र में आगमन के दौरान ग्रामीणों को इस धान का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। मान्यता है कि इसकी सुगंध भगवान बुद्ध और उनकी शिक्षाओं की याद दिलाती है। यह लोककथा इस धान को क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत से जोड़ती है।

पोषक तत्वों से भरपूर, प्रीमियम बाजार में संभावनाएं

कालानमक चावल अपने विशिष्ट स्वाद, सुगंध और पोषक गुणों के लिए जाना जाता है। इसमें प्रोटीन, आयरन सहित अन्य आवश्यक पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसका अपेक्षाकृत कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स (जीआई) भी उपभोक्ताओं के बीच आकर्षण का एक कारण बताया जाता है। हालांकि, रक्त में शर्करा के स्तर पर इसका प्रभाव भोजन की मात्रा, पकाने के तरीके, साथ में लिए जाने वाले खाद्य पदार्थों और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। इसलिए इसे मधुमेह के रोगियों के लिए बिना चिकित्सकीय सलाह के पूरी तरह सुरक्षित विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

बाजार में कालानमक चावल की कीमत लगभग 300 से 400 रुपये प्रति किलोग्राम बताई जाती है। हालांकि, वास्तविक कीमत गुणवत्ता, स्थान और बाजार की मांग के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इसकी विशिष्ट सुगंध और पारंपरिक पहचान किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त करने का अवसर दे सकती है। वास्तविक लाभ उत्पादन लागत, उपज और बाजार में मांग पर निर्भर करेगा।

रूमगरा और रिस्दी में शुरू हुआ प्रायोगिक उत्पादन

ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी संजय पटेल की पहल पर कोरबा जिले के रूमगरा और रिस्दी गांव में कालानमक धान की प्रायोगिक खेती शुरू की गई है। रूमगरा गांव के किसान विजय सिंह कंवर और शिवकुमार कंवर तथा रिस्दी गांव के किसान संजय कंवर इस प्रयोग में शामिल हैं।

इस प्रायोगिक खेती का उद्देश्य कोरबा जिले की स्थानीय मिट्टी और जलवायु में इस धान की उपयुक्तता का आकलन करना है। इसके माध्यम से फसल की वृद्धि, संभावित उत्पादन, सुगंध और दानों की गुणवत्ता का मूल्यांकन किया जाएगा। साथ ही प्राकृतिक खेती की पद्धतियों के माध्यम से इसके उत्पादन की संभावनाएं भी तलाश की जाएंगी।

गुणवत्तापूर्ण खेती से किसानों की आय बढ़ाने पर जोर

संजय पटेल के अनुसार, किसानों को केवल अधिक उत्पादन तक सीमित रहने के बजाय ऐसी विशिष्ट और गुणवत्तापूर्ण कृषि उपज की खेती के लिए भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिसकी बाजार में बेहतर कीमत मिल सके। कालानमक जैसी पारंपरिक सुगंधित धान की किस्में कृषि विविधीकरण और मूल्य आधारित खेती के नए अवसर उपलब्ध करा सकती हैं।

यदि कोरबा की मिट्टी और जलवायु में इसका प्रायोगिक उत्पादन सफल रहता है, तो भविष्य में अधिक किसानों को इसकी खेती के लिए प्रोत्साहित करने की दिशा में प्रयास किए जा सकते हैं। यह पहल प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, पारंपरिक धान किस्मों के संरक्षण और किसानों की आय एवं जीवन स्तर में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

हिन्दुस्थान समाचार/हरीश तिवारी

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हिन्दुस्थान समाचार / हरीश तिवारी

Livevns.news Desk
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