बस्तर दशहरा का अंतिम विधान मावली की डोली व दंतेश्वरी के छत्र की विदाई 27 अक्टूबर को
जगदलपुर, 25 अक्टूबर (हि.स.)। बस्तर दशहरा की समृद्ध लोक-आस्था और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक 'कुटुंब जात्रा' पूजा विधान पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। इस वर्ष बस्तर दशहरा की शुरुआत 12 अगस्त को मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर में 'पाट जात्रा' विधान से शुरू हुई थी। इसके बाद रथ परिक्रमा, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी और मुरिया दरबार, काछन जात्रा, 'कुटुंब जात्रा जैसे पड़ाव पूरे हुए। अब 27 अक्टूबर को माता मावली की डोली एवं मां दंतेश्वरी के छत्र को विदा किया जाएगा, जिसके साथ ही 75 दिवसीय बस्तर दशहरा का परायण आगामी वर्ष के लिए होगा।
गीदम रोड स्थित महात्मा गांधी स्कूल परिसर में आयोजित इस धार्मिक समागम में संभाग के 84 परगनों और सीमावर्ती क्षेत्रों से पहुंचे 1700 से अधिक देवी-देवताओं के प्रतीकों को पारंपरिक विधि-विधान से विदाई दी गई। वहीं छत्र और डोलियों के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।
दंतेश्वरी मंदिर के प्रधान पुजारी कृष्ण कुमार पाढ़ी के अनुसार बस्तर में सभी देवी-देवताओं का अपना एक विस्तृत परिवार यानी 'कुटुंब' होता है। दशहरा पर्व के दौरान विभिन्न गांवों और अंचलों के ग्राम्य देवी-देवता एक मंच पर एकत्र होते हैं और उत्सव में सहभागिता के बाद सम्मानपूर्वक विदा होते हैं। नारायणपुर, बड़े डोंगर, छोटे डोंगर और दक्षिण बस्तर के सुदूर वनांचलों से पहुंचे आंगा देव और देव-छत्रों का यह मिलन सैकड़ों गांवों की सामाजिक समरसता को प्रदर्शित करता है। 27 अक्टूबर को माता मावली की डोली एवं मां दंतेश्वरी के छत्र को दंतेवाड़ा के लिए विदा किया जाएगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे

