बस्तर दशहरा के बेल जात्रा पूजा' विधान में ‘युग्म बेल’ काे दंतेश्वरी मंदिर में स्थपित किया गया
जगदलपुर, 18 अक्टूबर (हि.स.)। रियासत कालीन बस्तर दशहरा पर्व में आज रविवार को ग्राम सरगीपाल में पारंपरिक 'बेल जात्रा पूजा' विधान परंपरानुसार संपन्न हुआ, ग्राम सरगीपाल से लाई गई ‘युग्म बेल’ काे दंतेश्वरी मंदिर में स्थपित किया गया। ग्राम सरगीपाल के प्राचीन बेल वृक्ष के समक्ष सैकड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में यह सदियों पुरानी रस्म निभाई गई।
इस अवसर पर बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने परंपराओं का निर्वहन किया। बेल देवी को श्रृंगार व अन्य पूजन सामग्री भेंट किया गया। इस दौरान दो बकरो की बलि दी गई। पूजा के बाद बेल न्यौता रस्म के दौरान चिन्हित जुड़वा बेल को तोड़ा गया। ग्रामीण बेल देवी को कन्या स्वरूप मानकर इसकी विदाई के रूप में हल्दी खेला गया। इस अवसर पर बस्तर सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप भी उपस्थित थे।
मां दंतेश्वरी मंदिर के प्रधान पुजारी कृष्ण कुमार पाढ़ी बताते हैं कि नवरात्र सप्तमी के दिन बेल पूजा का विशेष महत्व है। बेल फलों को देवी लक्ष्मी और सरस्वती का प्रतीक मानकर दंतेश्वरी मंदिर लाया जाता है। यह परंपरा वर्षों से जारी है इसलिए पूजा विधान के अनुरूप राज परिवार के सदस्य ग्राम सरगीपाल स्थित नियत बेल वृक्ष से जोड़ा बेल फलों को तोड़कर दंतेश्वरी मंदिर लाते हैं। उन्होने बताया कि बेल पूजा विधान के तहत यह निहित है, कि बेल वृक्ष का पहचान औषधीय है। पूजा विधान के माध्यम से जन सामान्य को अपनी कीमती वन औषधियों को बचाने का संदेश जाता है।
उन्होंने बताया कि जनश्रृति के अनुसार बस्तर के चालुक्य वंश के राजा सरगीपाल गांव के पास के जंगलो में शिकार करने गए थे, और वहां इस बेल वृक्ष के नीचे खड़ी दो सुंदर कन्याओं को देख राजा ने उनसे विवाह की इच्छा प्रकट की, जिस पर कन्याओं ने उनसे बारात लेकर आने को कहा, अगले दिन जब राजा बारात लेकर वहां पहुंचे तो दोनों कन्याओं ने उन्हें बताया कि वे उनके इष्ट देवी माणीकेश्वरी और दंतेश्वरी हैं, उन्होंने हंसी ठिठोली में राजा को बारात लाने को कह दिया था, इस वाकये से शर्मिंदा राजा ने दंडवत होकर अज्ञानता वश किए गए अपने व्यवहार केलिए क्षमा मांगते हुए उन्हें दशहरा पर्व में शामिल होने का न्योता दिया, और तब से यह विधान संपन्न की जा रही है।
ग्राम सरगीपाल के जूनापारा निवासी महादेव गदबा के आंगन में वर्षों से खड़े बेल वृक्ष की पूजा अर्चना की गई। माना जाता है कि यहीं पर देवियों ने तत्कालीन बस्तर महाराजा को दर्शन दी थीं। इसे बेल-जात्रा पूजा विधान कहा जाता है।
धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण होने के उपरांत पेड़ से युग्म बेल को तोड़कर परंपरानुसार कन्या स्वरूप मानकर इसकी विदाई के रूप में हल्दी खेलने के उपरांत जुड़वा बेल को जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर लाया गया, जहां इसे विधि पूर्वक स्थापित किया गया। तत्कालीन बस्तर महाराजा को देवियों के दर्शन से शुरू हुई यह परंपरा आज भी बस्तर की सांस्कृतिक गरिमा और अटूट लोक-आस्था के साथ जीवंत रूप से निभाई जा रही है।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे

