नक्सलवाद के खात्में के बाद पहला बस्तर दशहरा होगा जिसमें 40 वर्ष बाद शामिल हुए देवी-देवता

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नक्सलवाद के खात्में के बाद पहला बस्तर दशहरा होगा जिसमें 40 वर्ष बाद शामिल हुए देवी-देवता


जगदलपुर, 20 अक्टूबर (हि.स.)। रियासत कालीन बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक पहचान शताब्दियाें पुरानी परंपराओं के अनवरत निर्वहन इसे विश्व प्रसिद्ध विशिष्टता प्रदान करती हैं। 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा. जो अपनी अनोखी रस्मों, देवी-देवताओं की आस्था और जनजातीय संस्कृति के लिए जाना और पहचाना जाता है।

बस्तर नक्सलवाद के प्रभाव से मुक्त होते ही इसका प्रभााव भी बस्तर दशहरा में दिखने लगा है। बस्तर के अंदरूनी इलाकों से देवी देवता कभी नक्सलवाद के प्रभाव और दुर्गम जंगलों से असुरक्षा के चलते बस्तर दशहरा में शामिल नहीं हो पाते थे, वही देवी-देवता अब अपने पुजारियों और भक्तों के साथ बस्तर दशहरा पर्व के गवाह बन रहे हैं। गांव-गांव से आए पुजारी बताते हैं कि वो लगभग चार दशक बाद बस्तर दशहरा में आपने देवी-देवता को लेकर आए हैं।

पुजारी रामनाथ मंडावी कहते हैं कि मेरे बचपन में मेरे पिता और अन्य लोग देवी-देवता को लेकर बस्तर दशहरा में शामिल होने पहुंचते थे, लेकिन उनकी मृत्यु हो गई और नक्सल प्रभाव के कारण यह परंपरा छूट गई थी। लेकिन अब नक्सलवाद के समाप्ति के बाद लगभग 40 वर्ष बाद पुनः बस्तर दशहरा में शामिल हाे रहे हैं। टेमंल कमेटी से बस्तर दशहा में शमिल हाेने का न्योता मिला है। हम अपने खंडाबाबा देवता और उनके पुत्र मुया कुंवारी व काकड़ कोंआ देवताओं को लेकर पहुंचे हैं, जिन्हें आंगादेव भी हम कहते हैं।

पुजारी विशेश्वर मंडावी कहते हैं कि पहले नक्सल प्रभाव के कारण हम अपने देवी-देवता को यहां लेकर नहीं आते थे। माओवादियों से डर लगता था, इस वजह से हम इस बड़े आयोजन में नहीं शामिल होते थे। लेकिन नक्सलवाद खत्म हो गया और माओवादियों ने सरेंडर कर दिया। अब हम अपने देवी-देवता को खुशी से यहां लेकर आ रहे हैं। अब हम हर साल यहां आएंगे। हम भी पहली बार यहां अपने खंडाबाबा को लेकर आए हैं.।

नक्सलवाद के खात्में के बाद बस्तर दशहरा में लगभग 40 वर्षों बाद लौट रहे देवी-देवताओं की मौजूदगी पर्व को एक नया और आकर्षक रुप दे रही है। देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए भी यह बस्तर की जीवंत आदिवासी संस्कृति को करीब से समझने का मौका भी होगा। माओवाद के प्रभाव से प्रभावित रहे क्षेत्रों में शांति और सामान्य जनजीवन की ओर बढ़ते कदमों के बीच देवी-देवताओं की यह वापसी एक सकारात्मक सांस्कृतिक संदेश देती है।

शांति का यह संदेश है कि बस्तर की पहचान केवल संघर्ष और चुनौतियों से नहीं, बल्कि उसकी आस्था, परंपराओं और सामूहिक विरासत से भी है। जंगलों के बीच वर्षों से जीवित रही आस्था अब फिर व्यापक मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने जा रही है। यही वजह है कि इस बार का बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि परंपराओं की वापसी, सांस्कृतिक पुनर्मिलन और बदलते बस्तर की कहानी भी बनने जा रहा है।

हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे

Livevns.news Desk
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