कोरबा : पहाड़ की चोटी पर बसा आमापानी, जहां आज भी पानी, सड़क और बिजली के लिए संघर्ष कर रहे ग्रामीण

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कोरबा : पहाड़ की चोटी पर बसा आमापानी, जहां आज भी पानी, सड़क और बिजली के लिए संघर्ष कर रहे ग्रामीण


कोरबा : पहाड़ की चोटी पर बसा आमापानी, जहां आज भी पानी, सड़क और बिजली के लिए संघर्ष कर रहे ग्रामीण


कोरबा : पहाड़ की चोटी पर बसा आमापानी, जहां आज भी पानी, सड़क और बिजली के लिए संघर्ष कर रहे ग्रामीण


कोरबा : पहाड़ की चोटी पर बसा आमापानी, जहां आज भी पानी, सड़क और बिजली के लिए संघर्ष कर रहे ग्रामीण


कोरबा, 13 मई (हि. स.)। कोरबा जिले के पोड़ी उपरोड़ा विकासखंड अंतर्गत मानिकपुर ग्राम पंचायत का आश्रित गांव आमापानी आज भी विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर नजर आता है। जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर दुर्गम पहाड़ियों के बीच सबसे ऊंची चोटी पर बसे इस गांव तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है। कच्चे, पथरीले और उबड़-खाबड़ रास्तों को पार करने के बाद यह गांव दिखाई देता है, जहां करीब 150 की आबादी वाले आदिवासी परिवार वर्षों से मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जीवन गुजार रहे हैं। गांव में न सड़क है, न बिजली, न हैंडपंप और न ही शुद्ध पेयजल की कोई सरकारी व्यवस्था। इसके बावजूद ग्रामीण अपने संघर्ष और मेहनत के दम पर जिंदगी को आगे बढ़ा रहे हैं।

विडंबना यह है कि यह इलाका आकांक्षी ब्लॉक में शामिल है, जहां शासन द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क और रोजगार जैसी सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए विशेष योजनाएं संचालित किए जाने के दावे किए जाते हैं। लेकिन आमापानी गांव की स्थिति इन दावों की हकीकत बयां कर रही है। गांव तक सड़क नहीं होने के कारण चार पहिया वाहन तो दूर, माेटरसाइकिल तक पहुंच पाना मुश्किल हो जाता है। बारिश के दिनों में हालात और भी बदतर हो जाते हैं, जब पूरा गांव बाहरी दुनिया से लगभग कट जाता है।

ग्रामीण बताते हैं कि गांव पहाड़ी की सबसे ऊंची चोटी पर होने की वजह से यहां आज तक बोर खनन नहीं कराया गया। पानी के लिए सरकारी स्तर पर कोई सुविधा नहीं होने से ग्रामीणों ने खुद श्रमदान कर कुआं खोदा और प्राकृतिक जल स्रोतों के सहारे अपनी जरूरतें पूरी करनी शुरू कीं। यही कुआं आज गांव के लोगों के जीवन का एकमात्र सहारा बना हुआ है। गांव की महिलाएं और बच्चे रोजाना डेढ़ से दो किलोमीटर तक पैदल चलकर पानी लाते हैं। कई बार गर्मी में जल स्रोत सूखने लगते हैं, तब स्थिति और गंभीर हो जाती है।

ग्रामीण महिला सीता बाई ने बताया, “सुबह होते ही सबसे पहले पानी की चिंता सताने लगती है। घर का काम छोड़कर दूर से पानी लाना पड़ता है। कई बार बच्चों को भी साथ ले जाना पड़ता है। गर्मी में पानी कम हो जाता है तो घंटों इंतजार करना पड़ता है। हम लोग कब तक ऐसे ही जिंदगी जीते रहेंगे?”

एक अन्य महिला कमला देवी ने दर्द बयान करते हुए कहा, “गांव में सड़क नहीं होने से सबसे ज्यादा परेशानी बीमार और गर्भवती महिलाओं को होती है। किसी की तबीयत खराब हो जाए तो उसे खाट में उठाकर पहाड़ से नीचे लाना पड़ता है। बारिश के समय फिसलन इतनी बढ़ जाती है कि कई बार लोग गिरकर घायल हो जाते हैं। रात में कोई आपात स्थिति बन जाए तो भगवान भरोसे रहना पड़ता है।”

गांव के बुजुर्ग रामसाय कंवर ने कहा, “नेता चुनाव के समय आते हैं, हाथ जोड़ते हैं और सड़क-पानी-बिजली देने का वादा करते हैं। चुनाव खत्म होते ही कोई गांव की तरफ मुड़कर नहीं देखता। हमने खुद मेहनत करके रास्ता बनाया, कुआं खोदा, लेकिन सरकार की तरफ से आज तक कोई सुविधा नहीं मिली। अब उम्र हो गई है, लेकिन गांव की हालत वैसी ही है जैसी सालों पहले थी।”

ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासन गंभीरता दिखाए तो सोलर आधारित जल आपूर्ति योजना और छोटी सड़क निर्माण योजना के जरिए गांव की तस्वीर बदली जा सकती है। लेकिन अब तक गांव सिर्फ आश्वासनों तक सीमित रहा है।

आमापानी गांव की यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उन तमाम दूरस्थ ग्रामीण इलाकों की तस्वीर है जहां आज भी विकास कागजों तक सीमित नजर आता है। अब देखना होगा कि यह रिपोर्ट सामने आने के बाद प्रशासन गांव की सुध लेता है या फिर आमापानी के लोग इसी तरह संघर्षों के बीच जिंदगी बिताने को मजबूर रहेंगे।

इस संबंध में कोरबा कलेक्टर कुणाल दुदावत से पक्ष जानने के लिए संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका।

हिन्दुस्थान समाचार/ हरीश तिवारी

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हिन्दुस्थान समाचार / हरीश तिवारी

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