बस्तर दशहरा में आंगा देव तहसीलदार के निमंत्रण पर हाेते हैं शामिल
आंगा देव का विवाह व जन्म दिन भी मनाया जाता है
जगदलपुर, 12 अक्टूबर (हि.स.)। बस्तर दशहरा के मावली परघाव पूजा विधान के दाैरान बड़ी संख्या में आंगा देव काे चार ग्रामीण अपने कंधे में उठकर दाैड़ते झूमते दिखते हैं, जो तहसीलदार के लिखित निमंत्रण पर बस्तर दशहरा में शामिल होते हैं। रियासत काल से अब तक आंगा देव को बुलाने सरकारी प्रोटोकाल का पालन किया जाता है। बस्तर दशहरा में शामिल हाेने वाले आंगा देव की मेहमान की तरह विदाई की जाती है।
किसी खास गांव के आंगा को बुलाने के लिए ग्रामीण तहसीलदार को लिखित आवेदन देते हैं। इस आवेदन के साथ तयशुदा फीस भी पटाते हैं। इस रकम को प्राप्त करने के बाद तहसीलदार आंगा देव को बुलाने निमंत्रण जारी करता है। यह पत्र व सूचना संबंधित गांव के थाने को दी जाती है। निमंत्रण आवेदन की प्रतिलिपि के साथ श्रद्धालु उस गांव के थाने पहुंचते है। यहां से उन्हें गांव के मांझी मुखिया आंगा के पास ले जाते हैं। आंगा अपनी आराध्य देवी की अनुमति लेकर आवेदकों के साथ उनके गांव की ओर रवाना होते हैं।
करेकोट परगना के मंगलू मांझी ने बताया कि वे बड़े डोंगर व छोटे डोंगर की देवी और आंगा देव को न्यौता देने गए थे। आंगा बनने तथा प्राण प्रतिष्ठा के बाद मां भंगाराम देवी, उस देवी या देवता की परीक्षा भी लेती हैं। जहां आम तौर पर पूछा जाता है कि किस कुल की देवी या देवता हो, तुम्हारे माता पिता कौन हैं? आंगा जबरदस्ती बनाया गया है या तुमने प्रेरित किया। पुजारी किसे चुना, जैसे सवाल भी किये जाते हैं। उत्तर से संतुष्ट होने पर उसे आंगा देव की मान्यता दी जाती है।
घनश्याम सिंह नाग द्वारा लिखित किताब देवी मां तेलिन सती के मुताबिक आंगा देव प्राय: इरा, साजा, खैर या बेल की लकड़ी से बनाया जाता है। सम्बंधित देवता तय करते हैं कि किस पेड़ को काटा जाये। यह तय हो जाने के बाद गांव के लोगों के साथ सम्पर्क साधा जाता है, उसके बाद जिस गांव में पेड़ होता है, उस गांव के लोग वधू पक्ष की और आंगा बनाने वाले गांव के लोग वर पक्ष की भूमिका निभाते हैं।
वर पक्ष वालों को आदिवासी परम्परा के अनुसार तीन बार माहला मांगने जाना पड़ता है। अंतिम माहला में विवाह की तिथि तय की जाती है। इसके बाद जिन्हें आंगा बनना होता है, वे गाजे -बाजे के साथ बारात लेकर पहुंचते हैं। वृक्ष को काटने से पहले कन्यादान की रस्म पूरी होती है। नेंग के रूप में वस्त्र, चावल, दाल, बकरा, मुर्गा, नारियल, कबूतर व पेड़ काटने के बदले कुछ नगदी दी जाती है। रात में नाच गाकर विवाहोत्सव मनाते हैं। इसके बाद आवश्यकतानुसार लकड़ी चुनकर ले जाते हैं। आंगा बनाने का काम अन्य गोत्र के लोग करते हैं। तीन दिनों में आंगा तैयार किया जाता है। पवित्रता का पूरा ध्यान रखा जाता है, उसके बाद उसकी प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। समय-समय पर आंगा देवता का जन्मदिन भी मनाया जाता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे

