बस्तर दशहरा रथ निर्माण में नार फोड़नी व जंतरवाही की पूजा के साथ लोहार का काम हुआ शुरू

बस्तर दशहरा रथ निर्माण में नार फोड़नी व जंतरवाही की पूजा के साथ लोहार का काम हुआ शुरू


बस्तर दशहरा रथ निर्माण में नार फोड़नी व जंतरवाही की पूजा के साथ लोहार का काम हुआ शुरू


जगदलपुर, 21 सितंबर (हि.स.)। बस्तर दशहरा के लिए इस वर्ष आठ चक्कों के रथ का निर्माण हो रहा है। रथ बनाने वाले काष्ठ के कारीगरों के अलावा परंपरागत रूप से लोहार भी अपनी भागीदारी निभाते आ रहे हैं। नार फोड़नी रस्म को लेकर मान्यता है कि जंतरवाही पर बने औजार से पूजा विधान के बाद नवनिर्मित दुमंजिला रथ के पहियों के बीच में एक्सल के लिए छेद कर नार फोड़नी रस्म पूरा किया गया।

मान्यताओं के अनुसार नारफोड़नी से तात्पर्य नाल काटने से है। जिस प्रकार नवजात शिशु के जन्म के बाद नाल काटी जाती है। इस रस्म में रथ के पहिए पर लोहे के औजार से छेद किया जाता है, जिस पर एक्सल लगाया जाएगा। इसके साथ ही नवनिर्मित रथ का जन्म होगा या रथ आकार लेने लगेगा। बुधवार को नार फोड़नी रस्म के साथ ही जंतरवाही की पूजा कर लोहार भी अपना काम शुरू कर दिये। लोहार के मुिखया भागीरथी ने बताया कि सिरहासार भवन के ठीक बगल में स्थित पवित्र पत्थर की पूजा की जाती है। इसके बाद लोहा तपाने के लिए भट्टी लगाया जाता है।

लोहार के मुिखया भागीरथी ने बताया कि रथ के विभिन्न अंगों को जोड़ने के लिए स्थानीय बोली में आड़बाधन, जोड़ी खंभा, मगरमुंही, असांड, लाड़ी को जोड़ने के लिए लोहे की कील बनाई जाती है। रथ के विभिन्न हिस्सों और तीन भागों में तैयार चक्के को आपस में जोड़ने के लिए लोहार पारंपरिक औजारों से क्लैंप तैयार करते हैं इसे जोकी कहा जाता है। चक्के की धुरी पर बने छेद में लोहे की पट्टे को रिंग का आकार देकर चक्के के बीच में डाला जाता है। 08 चक्कों के रथ निर्माण में लगभग 03 क्विंटल लोहे का उपयोग किया जाता है।

भागीरथी ने बताया कि सिरहासार चौक में पुराने दशहरे के रथ के बीच इस पत्थर पर ही दशहरे की कील और एक्सल की पट्टी बनती है, स्थानीय ग्रामीण इस पत्थर को जंतरवाही के नाम से जानते हैं। यह पत्थर कर्मकारों (लोहार) की आराध्य देवी भी है। भागीरथी ने आज सूअर और बकरे की बलि देकर जंतरवाही की पूजा की। अब लोहार दशहरे में अपनी भागीदारी निभाएंगे। आज से रथ के लिए कील, गढदा (एक्सल की पट्टी) बनाने का काम शुरू होगा। भागीरथी बताते हैं कि रियासतकाल से ही कर्मकार इसी पत्थर पर रथ के लिए औजार बनाते आए हैं। बस्तर के कर्मकार इसे सबसे बड़ी देवी के तौर पर पूजते हैं।

हिन्दुस्थान समाचार/राकेश पांडे

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