समाज के ग़रीब, मिस्कीन और जरूरतमंद लोगों का हक़ है जकात: सैयद हसन

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समाज के ग़रीब, मिस्कीन और जरूरतमंद लोगों का हक़ है जकात: सैयद हसन


भागलपुर, 27 फ़रवरी (हि.स.)। शहर की प्रसिद्ध ख़ानकाह पीर दमड़िया शाह खलीफ़ाबाग भागलपुर सज्जादानशीन मौलाना सैयद शाह फख़रे आलम हसन ने शुक्रवार को ज़कात की अहमियत के बारे में विस्तार से चर्चा की। सैयद हसन ने कहा कि दीन का स्तंभ – ज़कात इस्लाम की बुनियादों में से है। जैसे नमाज़ बदन की इबादत है, वैसे ही ज़कात माल की इबादत है।

माल की पाकी – “ज़कात” का अर्थ ही है पवित्र करना और बढ़ाना। ज़कात देने से माल पाक होता है और बरकत आती है। गरीबों का हक़ – ज़कात समाज के ग़रीब, मिस्कीन और जरूरतमंद लोगों का हक़ है। इससे समाज में बराबरी और भाईचारा बढ़ता है। सामाजिक न्याय – अमीर और गरीब के बीच की दूरी कम होती है और समाज में संतुलन कायम होता है। ज़कात की फ़ज़ीलत (श्रेष्ठता) अल्लाह की रज़ा – ज़कात अदा करने से अल्लाह की ख़ुशी हासिल होती है। गुनाहों की माफ़ी – सच्चे दिल से दी गई ज़कात गुनाहों का कफ़्फ़ारा बनती है। आख़िरत में अज्र – क़यामत के दिन ज़कात देने वालों के लिए बड़ा सवाब और ऊँचा दर्जा होगा। मुसीबतों से हिफाज़त – हदीसों में आता है कि सदक़ा और ज़कात मुसीबतों को टालते हैं। ज़कात न देने की सज़ा, क़ुरआन में उन लोगों के लिए सख़्त चेतावनी है जो माल जमा करके रखते हैं और अल्लाह की राह में खर्च नहीं करते। क़यामत के दिन उनसे हिसाब लिया जाएगा।

निष्कर्ष

ज़कात केवल आर्थिक मदद नहीं, बल्कि एक इबादत और सामाजिक सुधार का ज़रिया है। यह दिलों को नरम बनाती है, समाज में मोहब्बत पैदा करती है और अल्लाह की रहमत का कारण बनती है। हर साहिब-ए-निसाब मुसलमान को चाहिए कि वह खुशी और ईमानदारी के साथ ज़कात अदा करे, ताकि उसका माल भी पाक हो और समाज भी खुशहाल बने।

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हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर

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