हिन्दी के संवर्धन और वैश्विक संवाद की भूमिका पर संगोष्ठी का आयोजन

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हिन्दी के संवर्धन और वैश्विक संवाद की भूमिका पर संगोष्ठी का आयोजन


नालंदा, बिहारशरीफ 11 जनवरी (हि.स.)।

नालंदा जिले के पयर्टक स्थल राजगीर में स्थित नालंदा विश्वविद्यालय में आज रविवार को “भाषा और नालन्दा परम्परा: हिन्दी के संवर्धन और वैश्विक संवाद में विविध संस्थाओं की भूमिका” विषयक पर द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य उद्घाटन सुषमा स्वराज सभागृह में किया गया।

मौके पर बताया गया है कि प्राचीन नालंदा की ज्ञान-परम्परा को आधुनिक संदर्भ में पुनर्स्थापित करते हुए यह आयोजन हिंदी को तकनीक, वैश्विक संवाद एवं भारतीय सभ्यता की दृष्टि से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण अकादमिक पहल है।उद्घाटन सत्र में माननीय कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने विषय-प्रवर्तन किया जिसमें उन्होंने हिंदी के संवर्धन में नालंदा परंपरा की भूमिका पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर बिहार संग्रहालय के महानिदेशक एवं बिहार सरकार के पूर्व मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह, अजरबैजान में भारत के राजदूत अभय कुमार, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक एवं पूर्व सांसद तरुण विजय तथा नालंदा विश्वविद्यालय के भाषा एवं साहित्मानविकी संकाय के अधिष्ठाता प्रोफेसर डी. वेंकट राव की गरिमामयी उपस्थिति रही। अपने संबोधन में प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि हिन्दी को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के लिए तकनीकी एकीकरण, अनुवाद तंत्र, और नई शब्दावली का विकास अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने रेखांकित किया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल माध्यम भाषाओं को जोड़ने का सशक्त माध्यम बन सकते हैं। साथ ही, भाषाओं के विकास में अंग्रेज़ी के बढ़ते प्रभाव जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए अकादमिक संस्थानों और हिन्दी सेवी संस्थाओं के बीच समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय को भाषाई विकास और बहुभाषिक संवाद का आधार केंद्र बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई।

तरुण विजय ने अपने वक्तव्य में भारत की सनातन चेतना, वैचारिक स्वतंत्रता और बौद्धिक पुनरुत्थान पर विचार साझा किए।उन्होंने भारत की अविजय चेतना के हजार वर्षों के अनुष्ठान, वैश्विक आक्रमणों के बावजूद भारतीय आत्मा के पुनरोदय तथा सोमनाथ और नालंदा के शक्ति, विद्या और ज्ञान केंद्र के रूप में पुनर्स्थापन की चर्चा की। उन्होंने पूर्वी एशिया में संस्कृत और भारतीय संस्कृति के व्यापक प्रभाव, थाईलैंड और म्यांमार में भारतीय परम्पराओं की उपस्थिति तथा कुमारजीव द्वारा चीन में भारतीय ज्ञान के रूपांतरण का उल्लेख किया।संगोष्ठी के प्रथम दिवस पर “भाषायी नवाचार और सम्पादकीय दृष्टि”, “नालंदा और साहित्यिक संस्कृति” तथा “भाषायी नवाचार: कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं तकनीकी अनुप्रयोग” जैसे सत्रों में देश-विदेश के प्रतिष्ठित विद्वानों ने सहभागिता की। दिन के अकादमिक विमर्श के साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ भी आयोजित की गईं, जिन्होंने भारतीय भाषाओं और परम्पराओं की जीवंत अभिव्यक्ति प्रस्तुत की।

नालंदा जैसे विरासत-स्थल पर यह महत्त्वपूर्ण आयोजन हिंदी को भावनात्मक और बौद्धिक स्तर पर जोड़ता हैं, जो इस भाषा को अतीत की गौरवशाली विरासत को भविष्य की संभावनाओं से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रमोद पांडे

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