कलाकारों के कठिन मेहनत जुनून और प्रतिबद्धता से जिन्दा है रंगकर्म : कुंदन वर्मा

कलाकारों के कठिन मेहनत जुनून और प्रतिबद्धता से जिन्दा है रंगकर्म : कुंदन वर्मा
कलाकारों के कठिन मेहनत जुनून और प्रतिबद्धता से जिन्दा है रंगकर्म : कुंदन वर्मा


कलाकारों के कठिन मेहनत जुनून और प्रतिबद्धता से जिन्दा है रंगकर्म : कुंदन वर्मा


सहरसा,02 अप्रैल (हि.स.)। हिन्दी रंगमंच दिवस के मौके पर शशि सरोजिनी रंगमंच सेवा संस्थान एवं किलकारी बिहार बाल भवन के नाट्य प्रशिक्षक कुंदन वर्मा से हुए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि हिन्दी रंगमंच से अभिप्राय हिन्दी और उसकी बोलियों के रंगमंच से है।

उन्होंने कहा कि हिन्दी रंगमंच की जड़ें रामलीला और रासलीला से आरम्भ होती हैं। हिंदी रंगमंच संस्कृत नाटक, लोक रंगमंच एवं पारसी रंगमंच की पृष्ठभूमि का आधार लेकर विकसित हुआ है। भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में ''नाट्य '' शब्द का प्रयोग केवल नाटक के रूप में न करके व्यापक अर्थ में किया है। जिसके अंतर्गत रंगमंच , अभिनय,नृत्य,संगीत,रस,वेशभूषा,रंगशिल्प , दर्शक आदि सभी पक्ष आ जाते हैं। भारतेन्दु हरिश्चंद्र हिन्दी रंगमंच के पुरोधा हैं। हिन्दी रंगमंच दिवस का मकसद है।

उन्होंने कहा कि रंगमंच के कर्मियों के प्रति जागरूकता लाना और इस खास दिन पर उनके कृतित्व से जो प्रभाव पैदा हो रहा है या हो चुका है। उस पर चर्चा करना, लेकिन समय के पहिये में इनका दिन कभी ऐसा नहीं आया। जिसमें ये खुद को समाज में सामाजिक, आर्थिक रूप से बेहतर स्तर पर रख सकें। बात समाज के सरोकार की हो तो कई नाटक और इसे मंच पर उतारने वाले हुनरमंद कलाकार हैं। लेकिन वैसे कलाकार अब विरले मिलते हैं या हैं ही नहीं, जिन्हें समाज में एक बेहतर ओहदे भी मिल सके। बिहार के लगभग सभी हिस्से विशेष कर मैं सहरसा से हूं तो यहां पर भी कोई नाटकीय मंच नहीं है।

उन्होंने कहा कि कला भवन है भी तो इसकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। इसके कारण नाटकों के मंचन में भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। इस वजह से प्रस्तुति में परेशानी आती है। उन्होंनें रंगकर्मियों की आर्थिक स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि कई नाट्य संस्थानों को समय पर अनुदान तक नहीं मिल पाता है। उन्हें इस काम से जुड़े रहने के लिए सपोर्ट भी नहीं मिल पाता है। रंगमंच मानव समुदाय के जीवन, संघर्ष और सौन्दर्यबोध की अभिव्यक्ति का आदिम कला-रूप है और यह पृथ्वी पर आखिरी मानव समूह के जीवित रहते मौजूद रहनेवाली कला-विधा है। यह जन मानस में उत्साह को बढ़ाते हुए अपने हुनर को जिंदा रखते हैं। हाल के दिनों में किसी भी सरकारी सांस्कृतिक मंचों पर केवल समूह गान, एकल गायन या नृत्य प्रस्तुति से ही यह पूरा हो चुका समझ लिया जाता है। जबकि यह इससे कहीं आगे है।हांलाकि सरकारें मनुष्य की आत्मिक उन्नति में सहायक इस आदिम कला के विकास के प्रति उदासीन रही है।

हिन्दुस्थान समाचार/अजय/गोविन्द

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