पर्यावरण संरक्षण के लिए  थारू समाज का अडतालीस घंटा का लॉक डाउन शुरू हुआ

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पर्यावरण संरक्षण के लिए  थारू समाज का अडतालीस घंटा का लॉक डाउन शुरू हुआ


पर्यावरण संरक्षण के लिए  थारू समाज का अडतालीस घंटा का लॉक डाउन शुरू हुआ


पश्चिम चम्पारण (बगहा),31अगस्त(हि.स.)।बिहार के पश्चिम चंपारण स्थित संतपुर-सोहरिया पंचायत में थारू

समाज पर्यावरण संरक्षण के लिए वर्ष में एक बार पारंपरिक बरना पर्व मनाते है,जिसकी शुरुआत 48 घंटा का 'ग्रीन लॉकडाउन' लागू करके करते हैं, इस दौरान गांव की रोजमर्रा की गतिविधियां पूरी तरह से ठप्प कर देते हैं। यह समाज अपने खेतों में न हल चलाता है, न मजदूरी करता है और न ही अनावश्यक आवाजाही,यहाँ तक की बाहरी लोगों को गांव के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगा देते हैं। ग्रामीण घरों में रहकर प्रकृति को दो दिन का 'आराम' करने का मौका देते हैं।

सोमावार को लाॅक डाउन लागू किये जाने के दौरान गांव की सीमा पर मौजूद एक ग्रामीण के अनुसार थारू समाज की मान्यता है कि मॉनसून के दौरान धरती पर हरियाली का नवसृजन होता है, नई वनस्पतियाँ, घास और पौधों का नवसृजन होता है।इनको नुकसान से बचाने के लिए बरना पर्व मनाकर ग्रामीण खुद को घरों तक सीमित रखते हुए सुरक्षित करते हैं,इस अवधि में पेड़ की पत्ती, घास या तिनका तोड़ना भी मना होता है।आगे बताया कि सामुदायिक नियमों का उल्लंघन करने पर पाँच सौ रूपया जुर्माना भी किसी पर लगाया जा सकता है।बताया किबरना पर्व की शुरुआत गांव के ब्रह्मस्थान पर वनदेवी की पूजा-अर्चना से हुई, इसके बाद पीपल के पेड़ यानी 'बरखाना' की विशेष पूजा की गई,उस समय गुरु ने मंत्रोच्चार करके किया , जबकि महिलाओं ने भोग अर्पित कर परिवार और समुदाय की सुख-समृद्धि की कामना की ।

ग्रामीण ने बताया कि लाॅक डाउन के दौरान भंडारी द्वारा बरना लगने की घोषणा के साथ ही गांव की सभी गतिविधियां बंद कर दी गई हैं।बरना पर्व के दौरान ग्रामीण पहले से ही जानवर और अपने लिए भोजन का प्रबन्ध करने के साथ, निगरानी के लिए आठ डेंगवाहक तैनात कर दिए गये हैं,जो डेंगवाहक हाथों में लाठी लेकर गांव की सीमाओं पर पहरा दे रहे हैं।

मान्यता के अनुसार अभिमंत्रित अक्षत से गांव की सीमा बांधी गई है। लाॅक डाउन पूरा होने के बाद पीपल के पेड़ की दोबारा पूजा की जायेगी, इसके बाद खर-पतवार हटाकर गांव में सामान्य गतिविधियां शुरू की जायेगी।इस दौरान पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य के साथ पर्व का समापन किया जायेगा। थारू समाज की यह परंपरा प्रकृति संरक्षण के साथ पर्यावरण को बचाये रखने के लिए अद्भुत मिसाल है।

हिन्दुस्थान समाचार/अरविंद नाथ तिवारी

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हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द नाथ तिवारी

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