मनाई गई रविन्द्र नाथ ठाकुर की 165 वीं जयंती

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मनाई गई रविन्द्र नाथ ठाकुर की 165 वीं जयंती


भागलपुर, 07 मई (हि.स.)। भागलपुर के कला केंद्र में रविन्द्र नाथ ठाकुर की 165 वीं जयंती पीस सेंटर परिधि द्वारा गुरुवार को मनाई गई। उल्लेखनीय है कि कला केंद्र में रविन्द्र नाथ ठाकुर की भव्य मूर्ति बनी हुई है और बगल में ही रविन्द्र मंच भी है। सामाजिक संगठनों की गतिविधियां कैसे की जाती है, इसे एस एम कॉलेज हिंदी विभाग की इंटर्नशिप कर रही छात्राओं ने भी पर्यवेक्षण किया और भाग भी लीं।

इस अवसर पर छात्राओं ने कहा कि रविन्द्र नाथ ठाकुर एशिया में नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय थे। रवि बाबू को उनकी कृति गीतांजलि के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। रविन्द्र नाथ ठाकुर बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वरिष्ठ संस्कृति कर्मी उदय ने कहा कि रवींद्रनाथ ठाकुर एक साथ कवि, गीतकार, कहानीकार, उपन्यासकार, चित्रकार और नाटककार थे। उन्होंने लगभग ढाई हजार के करीब गीत लिखे तथा उन गीतों की स्वरलिपि तैयार की जो रविन्द्र संगीत के नाम से पूरी दुनियां में प्रसिद्ध है। वे एक आध्यात्मिक और दार्शनिक व्यक्ति थे। रविन्द्र नाथ उच्च कोटि के शिक्षा शास्त्री थे। उनका मानना था कि प्रकृति सबसे बड़ा गुरु है। इसीलिए प्रकृति की गोद में उन्होंने शिक्षा केंद्र खोला और नाम रखा शांति निकेतन। वे मानवतावादी और प्रकृतिवादी थे। शांति निकेतन उनका ड्रीम प्रोजेक्ट था। छात्रों को तैयार करने में उनकी अहम भूमिका थी।

गांधी ने जो उन्हें गुरुदेव कहा, सही मायने में वे इसके हकदार थे। कलाकेंद्र के प्राचार्य राजीव कुमार सिंह उर्फ़ राहुल ने उन्हें श्रद्धांजलि देते कहा कि रविन्द्र नाथ ठाकुर का राष्ट्रवाद बहुभाषा और बहु संस्कृति पर आधारित था। वे विविधता के जबरदस्त पैरोकार थे। उनके लिखे दो गीत जन गण मन और अमार सोनार बांग्ला क्रमशः भारत और बंगला देश का राष्ट्रगान है। रंगकर्मी निरुपम कांति पाल ने कहा कि रविन्द्र नाथ ठाकुर 1912 ईस्वी में भागलपुर आए थे और यहाँ बंगीय साहित्य परिषद की स्थापना की। वे भारत की विविधता का सम्मान करते थे और विभिन्न संस्कृतियों का समन्वय चाहते थे। इसी उद्देश्य से देश भर में घूम घूम कर ऐसे संस्थानों की स्थापना कर रहे थे।

अभिजीत शंकर ने उन्हें मानवीय स्वभाव, मूल्य और अंतर मन के बेहतरीन चितेरे के रूप में याद करते हुए उनके द्वारा रचित कई उपन्यासों का जिक्र किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर

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