अतीत और वर्तमान को समझने का सशक्त माध्यम है संस्कृत : प्रो. वारिक
दरभंगा, 29 अगस्त (हि.स.)।
संस्कृत विश्वविद्यालय में चल रहे संस्कृत सप्ताह समारोह के पांचवें दिन शनिवार को ‘संस्कृतं विज्ञानं च’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई।
अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के अध्यक्ष छात्र कल्याण प्रो. पुरेंद्र वारिक ने कहा कि संस्कृत अतीत के साथ-साथ वर्तमान को जानने और समझने का सशक्त माध्यम है। भारतीय वैज्ञानिक चिंतन एवं ज्ञान परंपराओं को समझने में भी संस्कृत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक विज्ञान और प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के बीच संवाद स्थापित कर नई पीढ़ी के लिए अनुसंधान के नए आयाम विकसित किए जा सकते हैं। पीआरओ डॉ. निशिकान्त ने बताया कि संगोष्ठी में वक्ताओं ने विज्ञान और संस्कृत के बीच संबंधों को अलग-अलग दृष्टिकोण से रेखांकित किया।
सारस्वत अतिथि प्रो. दयानाथ झा एवं मुख्य वक्ता एलएनएमयू के रसायनशास्त्र विभाग के सहायक प्राचार्य डॉ. सोनूराम शंकर ने विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला। वक्ताओं ने संस्कृत शास्त्रों में वर्णित वैज्ञानिक तथ्यों को शास्त्रीय दृष्टि से प्रस्तुत करते हुए कहा कि संस्कृत और विज्ञान का संबंध केवल ऐतिहासिक गौरव तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के संदर्भ में भी इसका विशेष महत्व है।
वक्ताओं ने कहा कि संस्कृत की वैज्ञानिकता उसके सुव्यवस्थित व्याकरण, ध्वनि-विन्यास, शब्द-निर्माण और तार्किक वाक्य-विन्यास में दिखाई देती है। महर्षि पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ में लगभग चार हजार सूत्रों के माध्यम से भाषा को व्यवस्थित नियमों में प्रस्तुत किया गया है। यही नियमबद्धता आज कम्प्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स के अध्ययन में विशेष रुचि का विषय बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि पाणिनीय व्याकरण और आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बीच संवाद शोध का उभरता हुआ क्षेत्र है। संस्कृत का विज्ञान से संबंध कंप्यूटर विज्ञान तक सीमित नहीं है। आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, खगोल, वास्तु, धातुविज्ञान, दर्शन और तर्कशास्त्र जैसे भारतीय ज्ञान-विषयों का विशाल साहित्य संस्कृत में उपलब्ध है। आवश्यकता इस ज्ञान-संपदा को आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति, डिजिटल तकनीक और अनुसंधान से जोड़ने की है।
उपकुलसचिव डॉ. नवीन कुमार झा ने कहा कि एआई, प्राकृतिक भाषा संस्करण (एनएलपी), मशीन अनुवाद, डिजिटल टेक्स्ट विश्लेषण और ज्ञान-प्रतिनिधित्व जैसे क्षेत्रों में संस्कृत अध्ययन की नई संभावनाएं सामने आई हैं। संस्कृत की संधि, समास, रूप-विज्ञान और वाक्य-संरचना को कंप्यूटर द्वारा समझने के लिए पाणिनीय व्याकरण के नियमों के उपयोग पर शोध जारी है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. अवधेश श्रोत्रिय ने किया, जबकि सत्र संयोजन डॉ. सविता आर्या ने किया। स्वागत भाषण साहित्य विभाग के सहायक प्राचार्य एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ. सुधीर कुमार ने दिया। मौके पर वित्त पदाधिकारी डॉ. पवन कुमार झा, सीसीडीसी डॉ. शिवलोचन झा, परीक्षा नियंत्रक डॉ. निहार रंजन सिन्हा, डॉ. सुनील कुमार झा, डॉ. संतोष पासवान, डॉ. रामसेवक झा, डॉ. शम्भु शरण तिवारी, डॉ. भगलु झा, डॉ. छविलाल न्यौपाने, डॉ. प्रमोद मिश्र, डॉ. वरुण कुमार झा, डॉ. ममता पाण्डेय, डॉ. निशा, डॉ. गोपाल उपाध्याय सहित दर्जनों लोग मौजूद थे।
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हिन्दुस्थान समाचार / Krishna Mohan Mishra

