26 सितंबर से शुरू होगा पितृपक्ष, 16 दिनों तक पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अर्पित करेंगे लोग
किशनगंज, 21 सितंबर (हि.स.)। भारतीय संस्कृति में माता-पिता और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। सनातन धार्मिक परंपरा में पितृपक्ष को इसी भाव को समर्पित विशेष अवधि माना गया है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी सहित अन्य पूर्वजों का स्मरण करते हुए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और दान-पुण्य करते हैं। इस वर्ष पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष के दौरान श्रद्धा और विधि-विधान से किए जाने वाले कर्मों का विशेष महत्व है। पुरोहितों के अनुसार जिन पूर्वजों के निधन की तिथि ज्ञात होती है, उनका श्राद्ध उसी तिथि को करने की परंपरा है। वहीं सर्वपितृ अमावस्या को उन पूर्वजों के लिए श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या किसी कारण से उनका श्राद्ध नहीं हो पाया हो। महाकाल मंदिर के पुरोहित गुरु साकेत के अनुसार धार्मिक ग्रंथों में श्राद्ध कर्म के माध्यम से पितरों को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की मान्यता बताई गई है। उन्होंने गरुड़ पुराण का उल्लेख करते हुए कहा कि धार्मिक विश्वास के अनुसार श्राद्ध से संतुष्ट पितर आयु, संतान, यश, कीर्ति, बल, धन और धान्य की वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। उन्होंने कहा कि पितृपक्ष का मूल उद्देश्य पूर्वजों का स्मरण और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करना है।
पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध के साथ दान-पुण्य की भी परंपरा रही है। कई परिवार पूर्वजों की स्मृति में ब्राह्मण भोज, अन्नदान, जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और अन्य उपयोगी सामग्री का वितरण करते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में इन अनुष्ठानों की विधि और परंपराओं में कुछ अंतर देखने को मिलता है। गुरु साकेत बताते हैं कि हिंदू धार्मिक परंपरा में पितृ दोष की भी मान्यता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार पूर्वजों के प्रति उचित कर्म नहीं किए जाने से परिवार के जीवन में बाधाएं आने की धारणा है। इसी कारण पितृपक्ष में श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य कर पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त करने की परंपरा है। हालांकि पितृ दोष और उससे जुड़े प्रभाव धार्मिक मान्यताओं का विषय हैं, इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाता। पितृपक्ष धार्मिक अनुष्ठानों के साथ परिवार की नई पीढ़ी को पूर्वजों की स्मृतियों, उनके योगदान और पारिवारिक परंपराओं से जोड़ने का अवसर भी माना जाता है। श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता ही इस अवधि का प्रमुख भाव माना गया है।
हिन्दुस्थान समाचार / धर्मेन्द्र सिंह

