बुद्ध पूर्णिमा पर बोधगया में आध्यात्मिक संगम, जगद्गुरु साई माँ के नेतृत्व में जुटे 40 देशों के संत-साधक, काशी के विद्वानों द्वारा हुआ वैदिक ज्ञान यज्ञ
गया। बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर बिहार के बोधगया में एक ऐतिहासिक आध्यात्मिक आयोजन देखने को मिला, जहां परम पावन जगद्गुरु साई माँ के नेतृत्व में छह दिवसीय तीर्थयात्रा आयोजित की गई। इस यात्रा में 40 से अधिक देशों के आध्यात्मिक नेता, संन्यासी और साधक शामिल हुए, जिससे बोधगया एक वैश्विक आध्यात्मिक केंद्र के रूप में और अधिक प्रखर होकर उभरा।

ज्ञानस्थली बोधगया में गूंजा आत्मबोध का संदेश
इस विशेष अवसर पर जगद्गुरु साई माँ ने बोधगया की आध्यात्मिक महत्ता पर गहन विचार व्यक्त करते हुए कहा कि बोधगया केवल एक स्थान नहीं, बल्कि “मूल अवस्था, मूल स्वरूप और मूल बोध” का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि ज्ञान प्राप्ति किसी नए स्वरूप को धारण करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सत्य के पार देखने की अनुभूति है। उनके इस संदेश ने उपस्थित साधकों को आत्मचिंतन की ओर प्रेरित किया।
महाबोधि मंदिर और बोधि वृक्ष के नीचे ध्यान का विशेष महत्व
तीर्थयात्रा के दौरान प्रतिदिन महाबोधि मंदिर में दर्शन और पवित्र बोधि वृक्ष के नीचे ध्यान का आयोजन किया गया। इस दौरान विभिन्न देशों से आए साधकों ने एक साथ ध्यान साधना कर विश्व शांति की कामना की। वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया, जिसने इस आयोजन को और भी विशेष बना दिया।
अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में मिला सम्मान
2 मई को आयोजित अंतर्राष्ट्रीय आंतरिक शांति सम्मेलन इस यात्रा का प्रमुख आकर्षण रहा। ‘वट थाई मगध बौद्ध विपश्यना मठ’ में आयोजित इस सम्मेलन में जगद्गुरु साई माँ ने अंतरधार्मिक सभा की अध्यक्षता की। उनके मानवता के प्रति योगदान को देखते हुए उन्हें ‘अंतर्राष्ट्रीय आंतरिक शांति सम्मेलन पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।
काशी के विद्वानों द्वारा हुआ वैदिक ज्ञान यज्ञ
3 मई को बोधगया में ज्ञान यज्ञ का आयोजन किया गया, जिसमें काशी (वाराणसी) के 21 विद्वान ब्राह्मणों ने भाग लिया। आचार्य अतुल मालवीय के नेतृत्व में श्री जगन्नाथ मंदिर में यह वैदिक अनुष्ठान संपन्न हुआ। इस यज्ञ में भगवान विष्णु, भगवान जगन्नाथ, महालक्ष्मी और सप्तर्षियों का आह्वान किया गया, जिससे वैदिक परंपरा और बौद्ध धारा का अद्भुत संगम देखने को मिला।
सार्वजनिक दर्शन में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
तीर्थयात्रा के दौरान आयोजित सार्वजनिक दर्शन में 500 से अधिक श्रद्धालु पहुंचे। लोगों ने जगद्गुरु साई माँ से आशीर्वाद प्राप्त किया और आध्यात्मिक मार्गदर्शन लिया। इस दौरान श्रद्धालुओं में खासा उत्साह और आस्था देखने को मिली।
विष्णुपद मंदिर में पितृ पूजा के साथ हुआ समापन
इस छह दिवसीय तीर्थयात्रा का समापन 4 मई को गया के प्राचीन विष्णुपद मंदिर में पितृ पूजा और पिंडदान के साथ हुआ। इस अनुष्ठान के माध्यम से पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अर्पित की गई, जो भारतीय संस्कृति की गहरी परंपरा को दर्शाता है।
शांति का गूढ़ संदेश
सम्मेलन के दौरान साई माँ ने शांति के विषय में कहा कि शांति कोई लक्ष्य नहीं, बल्कि वह स्थिति है जो तब प्रकट होती है जब असत्य का अंत हो जाता है। उन्होंने बताया कि हर व्यक्ति के भीतर बुद्ध, तारा, आत्मा और परमात्मा का वास है, जिसे पहचानना ही सच्चा ज्ञान है।
यह छह दिवसीय आयोजन न केवल एक धार्मिक कार्यक्रम था, बल्कि वैश्विक स्तर पर आध्यात्मिक एकता, शांति और आत्मबोध का संदेश देने वाला एक ऐतिहासिक प्रयास भी साबित हुआ।

