संत समाज को लेकर और अधिक शोध करने की आवश्यकता है: प्रो. राजेंद्र बड़गूजर

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संत समाज को लेकर और अधिक शोध करने की आवश्यकता है: प्रो. राजेंद्र बड़गूजर


पूर्वी चंपारण,20 मार्च (हि.स.)। महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभाग, मानविकी व भाषा संकाय के तत्वावधान में 'संत साहित्य की सांस्कृतिक चेतना' विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन शुक्रवार को रूद्रा रेजेंसी के सभागार में हुआ। संगोष्ठी के द्वितीय दिवस के समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए मानविकी व भाषा संकाय के अधिष्ठाता एवं हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. राजेंद्र बड़गूजर ने अपने व्यक्तव्य में कहा कि पिछले सौ वर्षों में साहित्य का स्वरूप बदला है। संत साहित्य पर शोधार्थियों को और अधिक शोध करने की आवश्यकता है। संत की बातों को आम जनता सबसे अधिक समझती है।

संतों ने तत्कालीन समाज को बदलने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। वहीं नव नालंदा महाविहार (सम विश्वविद्यालय) से पधारे प्रो. रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव ने कहा कि संत साहित्य का केंद्र ईश्वर है। संत साहित्य वैज्ञानिक दस्तावेज है। श्रम की प्रतिष्ठा से सौंदर्य की प्रतिष्ठा स्थापित हुई है। संस्कृति गतिशील प्रक्रिया है। संत अनुभव एवं अनुभूति को केंद्र में रखा है। संत साहित्य लोक के आत्मा संवाद है। जबकि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो. विनय सिंह ने कहा कि भारत की भूमि मानवता की जन्म भूमि है। हमारी संस्कृति उदात्त है, यह चेतन की उन्नत प्रक्रिया है। संत आत्म चिंतन की बात करते हैं। करूणा व दया का भाव राष्ट्रीय संस्कृति की मूल विशेषता है।समापन सत्र में राष्ट्रीय संगोष्ठी के संयोजकद्वय डॉ.श्याम नन्दन,सहायक आचार्य हिन्दी-विभाग एवं डॉ.गोविन्द प्रसाद वर्मा सहायक आचार्य, हिन्दी-विभाग की भी मंच पर उपस्थिति रही ।मंचासीन अतिथियों के साथ ही उपस्थित शोधार्थियों और विद्यार्थियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए राष्ट्रीय संगोष्ठी के संयोजक डॉ. श्याम नन्दन ,सहायक आचार्य,हिन्दी-विभाग ने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों से हमारे शोधार्थियों और विद्यार्थियों की साहित्यिक-सांस्कृतिक चेतना जागृत होती है।

उन्होंने कहा कि यह एक ऐसा दुर्लभ संयोग है जिसमें एक साथ कई पीढ़ियाँ सम्मिलित हैं। संगोष्ठी की आख्या प्रस्तुति शोधार्थी अस्मिता पटेल ने किया ।मंच का सफल संचालन विभाग के पोस्ट डॉक्टरेट शोधार्थी डॉ. मनीष भारती ने किया। कार्यक्रम में प्रो. विनय सिंह को प्रशस्ति पत्र भेंट किया गया। अंत में संगोष्ठी के सफल संयोजन के लिए विभाग के शिक्षकों संयोजकद्वय डॉ.श्याम नन्दन व डॉ.गोविन्द प्रसाद वर्मा और सह-संयोजकद्वय डॉ.गरिमा तिवारी व डॉ.आशा मीणा को आगत अतिथियों ने समेकित रूप से प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया। इसके साथ दो तकनीकी सत्र एवं एक समानांतर सत्र का भी आयोजन किया गया।

प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता करते हुए विश्व भारती शांति निकेतन विश्वविद्यालय से पधारी प्रो. शकुंतला मिश्र ने कहा कि रवीन्द्र नाथ टैगोर ने शांति निकेतन में संत साहित्य पर अधिक बल दिया। भिति चित्र के माध्यम से एवं विभिन्न प्रकार के आयाम से संतों की महिमा को प्रदर्शित एवं प्रस्तुत करने की कोशिश किया गया है, रवीन्द्र नाथ की दृष्टि में संत साहित्य को पुरजोर ढंग से रखा गया है।

वहीं मोतिहारी स्थित श्री कृष्ण महिला महाविद्यालय से पधारी डॉ. अर्पणा ने विशिष्ट वक्तव्य में कहा कि संतों की कथनी-करनी में अंतर नहीं है। संत साहित्य जागरण का साहित्य है सांस्कृतिक चेतना का लोकतांत्रिककरण है, सभी धर्म की रूढ़ियों पर प्रहार संत साहित्य में होता है। विशिष्ट वक्तव्य एवं विषय प्ररवर्तन के लिए श्री कृष्ण महिला महाविद्यालय से पधारी सहायक आचार्य डॉ. कुमारी रौशनी विश्वकर्मा ने कहा कि संतों की महिमा का विभिन्न उदाहरणों द्वारा बखान किया गया है। संतों ने अहं को त्याग कर वयं को स्वीकार किया। संत शब्द सर्वप्रथम विष्णु सहस्त्रनाम में आया है। इस अवसर पर पूरे सत्र का संचालन नारी शक्ति के द्वारा हुआ, वहीं तीन शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र का वाचन भी किया। उक्त सत्र का संचालन शोधार्थी अपराजित ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन शोधार्थी सुनंदा गहराईं ने किया।

समानांतर सत्र का संचालन अंग्रेजी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. दीपक की अध्यक्षता में संचालित हुआ। जिसमें ग्यारह विद्यार्थी एवं शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र का वाचन किया।इस सत्र का संचालन विभाग के शोधार्थी पवन कुमार ने किया।

दूसरे तकनीकी सत्र की अध्यक्षता करते हुए मानविकी व भाषा संकाय और हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. राजेंद्र बडगूजर ने कहा कि संतों का साहित्य स्वाभिमान का साहित्य है। संत साहित्य समाज से सम्मानित जीवन जीने की मांग की है। रविदास परिश्रम को ही ईश्वर के रूप में पूजते हैं।

वहीं मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. राम जी तिवारी ने कहा कि संतों के काव्य का लक्ष्य वर्ण, अर्थ, संग, रस, छंद, मंगल विधान है। संत साहित्य अनुभव परक एवं यथार्थ परक है। संतों की कविता का लक्ष्य रंजन नहीं अपितु मंगल विधान है। प्रेम तत्व की बात सभी संतो ने की, यही कविता को सार्थक बनती है। संतों ने प्रेम को भक्ति के माध्यम से वासना से ऊपर उठाकर पारस बना दिया। काव्य के लक्ष्य को निर्धारित करते हुए कबीर, तुलसी और जायसी को उन्होंने अपने संबोधन में संदर्भित किया।

जबकि विशिष्ट वक्ता के रूप में डॉ. अवनीश कुमार मिश्र ने कहा की संत साहित्य का पुनरावलोकन करना अपने समय की समस्याओं को ढूंढने जैसा है। संत साहित्य को विभाजित करके नहीं देखना चाहिए। उसे संपूर्ण भक्ति काल के रूप में देखना चाहिए। प्रेम की वीरता को प्रतिपादित करने का काम करते हैं। आधुनिक काल का स्वर्ण युग छायावाद है जिसमें निराला तुलसीदास जैसे काव्य की रचना की। अंग्रेजी विभागाध्यक्ष विमलेश कुमार सिंह एवं डॉ. अशोक बत्रा ने अपने गायन एवं कविताओं के माध्यम से पूरे सभागार को मंत्र मुग्ध कर दिया। उक्त सत्र का संचालन शोधार्थी महेश कुमार ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन सहायक आचार्य डॉ. आशा मीणा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / आनंद कुमार

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