एमजीसीयू में डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती पर वैचारिक संगोष्ठी आयोजित

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एमजीसीयू में डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती पर वैचारिक संगोष्ठी आयोजित


-लोकतंत्र, समानता और मानवाधिकारों पर हुआ गहन विमर्श

पूर्वी चंपारण,14 अप्रैल (हि.स.)। महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय में भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती के अवसर पर एक भव्य संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न प्रतिष्ठित शिक्षाविदों ने भाग लेते हुए बाबासाहेब के बहुआयामी व्यक्तित्व, उनके विचारों और समकालीन प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव ने कहा कि डॉ. अंबेडकर के विचार आज भी भारतीय समाज को दिशा देने में सक्षम हैं। उन्होंने अंबेडकर के प्रसिद्ध कथन “शिक्षा शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा, वह दहाड़ेगा” का उल्लेख करते हुए शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का मूल आधार बताया। उन्होंने ‘डिकॉलोनाइजेशन ऑफ माइंड’ और भारतीय संदर्भ में पाश्चात्य विचारों के समुचित प्रयोग की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि अंबेडकर ने पश्चिमी अवधारणाओं को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढालकर सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कुलपति ने अंबेडकर के जीवन में महिलाओं की प्रेरक भूमिका का उल्लेख करते हुए उनकी माता भीमाबाई, पत्नी रमाबाई और डॉ. सविता अंबेडकर के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने संविधान के भाग-4 (नीति निदेशक तत्व) में अंबेडकर की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि संविधान की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे लागू करने वाले लोग कितनी निष्ठा और ईमानदारी से उसका पालन करते हैं। मुख्य वक्ता डॉ. राजकुमार फलवारिया ने डॉ. अंबेडकर को एक वैश्विक व्यक्तित्व बताते हुए कहा कि वे केवल दलितों के नेता नहीं, बल्कि एक महान अर्थशास्त्री, विधिवेत्ता, पत्रकार, समाज सुधारक और दूरदर्शी चिंतक थे। उन्होंने अंबेडकर के शैक्षणिक जीवन, विशेषकर कोलंबिया विश्वविद्यालय में उनकी उत्कृष्ट उपलब्धियों का उल्लेख किया। साथ ही ‘मूकनायक’, ‘बहिष्कृत भारत’ और ‘जनता’ जैसे पत्रों के माध्यम से सामाजिक जागरूकता फैलाने के उनके प्रयासों को सराहा।

उन्होंने बताया कि 1936 में श्रमिकों के अधिकारों के लिए उन्होंने राजनीतिक संगठन का गठन किया और हिंदू कोड बिल के माध्यम से महिलाओं को अधिकार दिलाने का प्रयास किया। जेएनयू के डॉ. निशांत कुमार ने अपने वक्तव्य में लोकतंत्र के विभिन्न आयामों पर विचार रखते हुए “डायलेक्टिक्स ऑफ डिलेमा” की अवधारणा के तहत लोकतंत्र, समानता और स्वतंत्रता के अंतर्विरोधों को स्पष्ट किया।

उन्होंने कहा कि संविधान को समझने से पहले उसकी ‘स्पिरिट’ को समझना आवश्यक है। अम्बेडकर ने ‘वन पर्सन, वन वोट, वन वैल्यू’ के सिद्धांत को लोकतंत्र की आधारशिला बताते हुए कहा कि अंबेडकर ने सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में भी इस सिद्धांत को लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया था। डॉ. निशांत कुमार ने यह भी कहा कि एक सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिए ‘कलेक्टिव कॉन्शियसनेस’ और ‘सेंस ऑफ बिलॉन्गिंग’ अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने संसदीय लोकतंत्र को अधिक प्रभावी बताते हुए कहा कि इसमें जनता को अपने प्रतिनिधियों का मूल्यांकन करने और आवश्यकतानुसार परिवर्तन करने का अवसर मिलता है। अम्बेडकर ने एक सफल लोकतंत्र के लिए सामाजिक-आर्थिक असमानता का न्यूनतम स्तर, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा, प्रभावी विपक्ष और विधि के समक्ष समानता को अनिवार्य बताया। दिल्ली विश्वविद्यालय की डॉ. स्मिता अग्रवाल ने अपने वक्तव्य में मानवाधिकारों के संदर्भ में डॉ. अंबेडकर के योगदान को रेखांकित किया।

आगे कहा कि अंबेडकर ने न केवल दलितों और वंचितों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया, बल्कि महिलाओं के अधिकारों को सुदृढ़ करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अम्बेडकर ने हिंदू कोड बिल के माध्यम से महिलाओं को संपत्ति और सामाजिक अधिकार दिलाने के प्रयासों का उल्लेख किया। डॉ. अग्रवाल ने संविधान के प्रावधानों, विशेषकर अनुच्छेद 31-ए और 31-बी के संदर्भ में सामाजिक न्याय और भूमि सुधारों की दिशा में अंबेडकर की सोच को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने यह भी कहा कि अंबेडकर के आर्थिक विचार, कृषि और श्रम क्षेत्र में उनके योगदान आज भी नीतिनिर्माण के लिए मार्गदर्शक हैं। कार्यक्रम के विषय प्रवर्तन, स्कूल ऑफ कंप्यूटेशनल साइंस के डीन प्रो रंजीत कुमार चौधरी ने किया और मंच संचालन डॉ अभिलाषा ने की।

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हिन्दुस्थान समाचार / आनंद कुमार

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