प्रो. डॉ. प्रेम प्रभाकर की 5वीं पुण्यतिथि पर स्मृति सभा आयोजित, सामाजिक और सांस्कृतिक अवदानों को किया गया याद

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प्रो. डॉ. प्रेम प्रभाकर की 5वीं पुण्यतिथि पर स्मृति सभा आयोजित, सामाजिक और सांस्कृतिक अवदानों को किया गया याद


भागलपुर, 06 नवंबर (हि.स.)। सामाजिक और सांस्कृतिक संस्था 'परिधि' द्वारा आज प्रख्यात शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता और संस्कृतिकर्मी प्रो. डॉ. प्रेम प्रभाकर की 5वीं पुण्यतिथि पर एक गरिमामयी स्मृति सभा का आयोजन किया गया। इस आयोजन में उनके सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के सहकर्मियों, छात्रों, परिजनों और विभिन्न पेशों से जुड़े सहयोगियों ने हिस्सा लेकर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उदय ने कहा कि डॉ. प्रभाकर गंगा मुक्ति आंदोलन, झुग्गी झोपड़ी संघर्ष समिति और संपूर्ण क्रांति आंदोलन से गहराई से जुड़े हुए थे।

उन्होंने अपने सामाजिक जीवन की शुरुआत बीड़ी मजदूर यूनियन के पदाधिकारी के रूप में की थी। वहीं, शिशुपाल भारती ने कहा कि भागलपुर में संपूर्ण क्रांति जमात से जुड़े साथियों के बीच संस्थागत काम की पहचान उन्होंने ही कराई थी। उनके पास आते ही शिक्षक और छात्र के बीच का अंतर मिट जाता था। हमारे दृष्टि निर्माण में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा।

वक्ताओं ने डॉ. प्रभाकर के बहुआयामी व्यक्तित्व को याद करते हुए आकाशवाणी (रेडियो) में उनके लंबे जुड़ाव की चर्चा की। उन दिनों जब रेडियो का बोलबाला था, तब 'ग्राम जगत' कार्यक्रम में 'माखन भाई' के रूप में उनकी भूमिका अत्यंत चर्चित थी। रेडियो पर प्रसारित उनका रूपक (फीचर) मेघा छाए आधी रात काफी लोकप्रिय हुआ और लंबे समय तक बजता रहा। इसके साथ ही उन्होंने कुछ समय तक सक्रिय पत्रकारिता भी की थी। वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत ने अंगिका भाषा और साहित्य में डॉ. प्रभाकर के योगदान को याद किया। डॉ. प्रभाकर लंबे समय तक तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे और वे विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर अंगिका विभाग व पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष (हेड) भी रहे।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए ललन ने कहा कि अंग चंपा जैसी लघु और अनियतकालीन पत्रिका के प्रकाशन के इतिहास में उनका योगदान अविस्मरणीय रहेगा। डॉ. प्रभाकर को पेंटिंग्स, नाटक और गीतों के विश्लेषण में महारथ हासिल थी। वे 'माध्यम' संस्था के संस्थापक संयोजक थे, जो उन दिनों नाटक और सांस्कृतिक आयोजन करने वाली एक महत्वपूर्ण संस्था थी। शेखर के साथ मिलकर पहली मंजूषा चित्र कला को अस्तित्व में लाने में भी उनकी ऐतिहासिक भूमिका थी।

कला केंद्र के प्राचार्य राजीव कुमार सिंह ने बताया कि भागलपुर विश्वविद्यालय में छात्र कल्याण संकाय के अध्यक्ष और विश्वविद्यालय सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के समन्वयक रहते हुए डॉ. प्रभाकर ने कला-संस्कृति के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया। उनके प्रयासों से ही बड़े पैमाने पर युवा महोत्सवों का आयोजन संभव हो सका, जिससे युवाओं की पहुंच राष्ट्रीय स्तर तक सुनिश्चित हुई। वे चित्रकला के एक मर्मज्ञ विश्लेषक भी थे। साहित्य के सिलसिले में उनसे जुड़े डीआर हबीब मुर्शिद खान ने भी उनके साथ अपने गहरे संबंधों को याद किया।

श्रद्धांजलि सभा में मुख्य रूप से उदय, सुनील कुमार रंग, शिशुपाल भारती, मो. तकी अहमद जावेद, स्मिता कुमारी, हबीब मुर्शिद खान, मनोज कुमार, मृदुला सिंह, प्रसून लतांत, कपिल देव कृपाल, राहुल, ललन, मो. बाकिर हुसैन, उर्वशी प्रभाकर, संजना शिखा, सोनिया, अनुभव प्रभाकर सहित कई अन्य प्रबुद्ध लोग और परिजन मौजूद थे।

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हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर

Livevns.news Desk
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