मंजूषा हटिया लोक कला प्रदर्शनी संपन्न, नवाचार और परंपरा का अद्भुत संगम बना आकर्षण
भागलपुर, 06 जुलाई (हि.स.)। भागलपुर के संग्रहालय में आयोजित ‘मंजूषा हटिया’ लोक कला प्रदर्शनी सोमवार को सम्पन्न हो गया। अंग प्रदेश की गौरवशाली लोक चित्रकला मंजूषा कला के संरक्षण, संवर्धन एवं कलाकारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से आयोजित इस प्रदर्शनी में जिले सहित आसपास के क्षेत्रों के 50 से अधिक मंजूषा कलाकारों ने अपनी उत्कृष्ट एवं विविधतापूर्ण कलाकृतियों का प्रदर्शन किया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कला प्रेमियों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों तथा आम नागरिकों की उपस्थिति रही, जिन्होंने कलाकारों की कलाकृतियों का अवलोकन करने के साथ-साथ उनसे सीधे कलाकृतियाँ खरीदकर उन्हें प्रोत्साहित भी किया।
कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन अंकित रंजन जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी सह सहायक संग्रहालयाध्यक्ष द्वारा किया गया। उद्घाटन अवसर पर शिव शंकर सिंह ‘पारिजात’, राजीवकान्त मिश्रा, मनोज पंडित, डॉ. उलूपी झा सहित अनेक गणमान्य अतिथि, पदाधिकारी, वरिष्ठ कलाकार, युवा कलाकार एवं कला प्रेमी उपस्थित रहे।
सभी अतिथियों ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया तथा कलाकारों द्वारा किए जा रहे रचनात्मक कार्यों की सराहना की। अपने उद्घाटन संबोधन में जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी ने कहा कि ‘मंजूषा हटिया’ केवल एक प्रदर्शनी नहीं, बल्कि मंजूषा कलाकारों के लिए संवाद, सीखने और नवाचार का साझा मंच है। यहाँ विभिन्न क्षेत्रों के कलाकार एक साथ आते हैं, अपने अनुभव साझा करते हैं, नई तकनीकों पर चर्चा करते हैं तथा पारंपरिक कला को आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत करने के प्रयोगों को एक-दूसरे से साझा करते हैं।
उन्होंने कहा कि किसी भी कलाकार के लिए अपनी कला को सीधे दर्शकों और खरीदारों के समक्ष प्रस्तुत करने का इससे बेहतर अवसर नहीं हो सकता। यह मंच कलाकारों को पहचान देने के साथ-साथ उन्हें आर्थिक रूप से भी सशक्त बनाने का माध्यम बन रहा है।
इस प्रदर्शनी की सबसे बड़ी विशेषता कलाकारों द्वारा मंजूषा कला में किए गए नवाचार एवं प्रयोग रहे, जिन्होंने आगंतुकों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से फाइन आर्ट में स्नातक सोनाली कुमारी ने चुकंदर, धनिया एवं हल्दी से प्राप्त प्राकृतिक रंगों का उपयोग कर मंजूषा चित्रों का निर्माण किया। उनके इस प्रयोग ने यह संदेश दिया कि पारंपरिक लोक कला को पर्यावरण के अनुकूल प्राकृतिक माध्यमों से भी समृद्ध किया जा सकता है।
वरिष्ठ मंजूषा कलाकार माला घोष ने अपने चित्रों के बैकग्राउंड को गोबर से तैयार कर उस पर पारंपरिक मंजूषा चित्रांकन किया। उनके इस प्रयोग ने भारतीय ग्रामीण परंपरा, प्राकृतिक संसाधनों तथा लोक कला के अद्भुत समन्वय को प्रस्तुत किया। प्रदर्शनी का एक अन्य आकर्षण सरकारी विद्यालय की शिक्षिका प्रियंवदा द्वारा प्रस्तुत क्रोशिया शैली में ऊन से निर्मित मंजूषा मोटिफ्स रहे। यह प्रयोग दर्शाता है कि मंजूषा कला केवल चित्रांकन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे वस्त्र, शिल्प एवं सजावटी कलाओं में भी प्रभावी रूप से विकसित किया जा सकता है।
आगंतुकों ने इन सभी नवाचारी प्रस्तुतियों की मुक्त कंठ से सराहना की। कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण पक्ष कलाकारों को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ उपलब्ध कराना भी रहा। प्रदर्शनी के दौरान कला प्रेमियों ने कलाकारों से सीधे उनकी कलाकृतियाँ खरीदीं।
कार्यक्रम के दौरान कलाकारों ने एक-दूसरे की कलाकृतियों का अवलोकन किया तथा तकनीकी विषयों, रंग संयोजन, पारंपरिक स्वरूप, डिज़ाइन, सामग्री एवं नवाचारों पर विचार-विमर्श किया। युवा कलाकारों ने वरिष्ठ कलाकारों से मार्गदर्शन प्राप्त किया, जबकि वरिष्ठ कलाकारों ने नई पीढ़ी के प्रयोगों की सराहना करते हुए उन्हें परंपरा से जुड़े रहने का संदेश दिया।
समापन अवसर पर जिला कला एवं संस्कृति कार्यालय, भागलपुर ने आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी कलाकारों, संयोजकों, अतिथियों, कला प्रेमियों, मीडिया प्रतिनिधियों एवं उपस्थित नागरिकों के प्रति आभार व्यक्त किया।
आयोजकों ने विश्वास व्यक्त किया कि ‘मंजूषा हटिया’ का यह नियमित आयोजन भविष्य में मंजूषा कला को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने के साथ-साथ कलाकारों के लिए स्थायी बाजार एवं बेहतर अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर

