कारगिल युद्ध के बाद कॉम्बिंग ऑपरेशन में शहीद चितरंजन के परिजन की सुध लेने वाला कोई नहीं
बक्सर, 25 जुलाई (हि.स.)।देश आज 27वां कारगिल विजय दिवस मना रहा है । आज ही के दिन 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना के जाबांज जवानों ने अदम्य साहस और वीरता का प्रदर्शन करते हुए ऑपरेशन विजय के तहत पाकिस्तानी सेना को धूल चटाते हुए दुश्मन के कब्जे से कई महत्वपूर्ण चोटियों को मुक्त कराया था । वहीं इस कारगिल युद्ध के बाद हुए कॉम्बिंग ऑपरेशन में डुमरांव प्रखंड के चिलहरी गांव निवासी चितरंजन सिंह ने आंतकवादियों के साथ मुठभेड़ के दौरान अपनी महान शहादत दी थी, जिसके लिए उन्हें मरणोपरांत राष्ट्रपति वीरता पदक से सम्मानित किया गया था ।
चिलहरी निवासी स्व. गुप्तेश्वर सिंह के बड़े पुत्र शहीद चितरंजन सिंह उस समय जम्मू कश्मीर में तैनात थे । जहां 20 अगस्त 2001 को कुपवाड़ा जिले के नागरी जंगल में आंतकवादियों के छिपे होने की जानकारी मिली । जिसके बाद कॉम्बिंग ऑपरेशन शुरू हुआ । इस ऑपरेशन के दौरान उनकी आंतकवादियों से मुठभेड़ हो गई, जिसमें उन्होंने वीरता दिखाते हुए दो आंतकवादियों को मार गिराया । तभी एक आंतकवादी ने छुपकर धोखे से उनपर गोली चला दी, जो उनके आंख में लगी । जिससे वो शहीद हो गए । उस समय उनकी उम्र मात्र 30 वर्ष थी । इससे पहले वे भारतीय सेना में 12 वर्ष 6 माह तक सेवा दे चुके थे । आज देश शान से कारगिल विजय दिवस मना रहा है तो दूसरी तरफ कारगिल युद्ध के बाद कॉम्बिंग ऑपरेशन में शहीद होनेवाले शहीद चितरंजन सिंह के परिजनों को सुध लेने वाला कोई नहीं है । शहीद की पत्नी इंदु देवी तथा इकलौते पुत्र दिलीप सिंह को शहीद चितरंजन सिंह की शहादत के लगभग 25 वर्ष होने के बावजूद आज भी सरकार द्वारा उनके महान शहादत के अनुरूप मिलने वाले सम्मान का इंतजार है ।
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हिन्दुस्थान समाचार / Jitendra Mishra

