बाढ़ की गाद किसानों के लिए वरदान, पर बरतें सावधानी : डीएओ
कटिहार, 20 सितंबर (हि.स.)। बाढ़ के पानी के साथ खेतों में जमा होने वाली प्राकृतिक नदीय गाद (सिल्ट) केवल नुकसान नहीं, बल्कि मिट्टी की उर्वरता और संरचना सुधारने का प्राकृतिक जरिया बन सकती है। बशर्ते किसान इसका वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करें। जिला कृषि पदाधिकारी (डीएओ) राजीव कुमार ने किसानों को सलाह दी है कि वे बाढ़ के बाद खेतों में जमा गाद को केवल आपदा के रूप में न देखें, बल्कि उसकी गुणवत्ता परखकर खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में उसका उपयोग करें।
डीएओ के अनुसार, स्वच्छ नदीय गाद में महीन खनिज कण, कार्बनिक पदार्थ और आवश्यक पोषक तत्व होते हैं। यह मिट्टी की भौतिक बनावट सुधारने, जलधारण क्षमता बढ़ाने और कटाव ग्रस्त ऊपरी परत के पुनर्निर्माण में मदद करती है। साथ ही यह मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के लिए भी अनुकूल वातावरण तैयार करती है। ऐसे में यदि गाद स्वच्छ नदी या प्राकृतिक जलधारा से आई है, तो पानी सूखने के बाद उसे खेत की मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए।
बिना मृदा परीक्षण रासायनिक खादों से परहेज
कृषि विभाग ने किसानों को हिदायत दी है कि गाद जमा होने के बाद बिना सोचे-समझे यूरिया, डीएपी या अन्य रासायनिक उर्वरकों की अतिरिक्त खुराक न डालें। आगामी रबी या अन्य फसलों की बुआई से पहले खेत की मिट्टी की जांच (मृदा परीक्षण) अवश्य कराएं। परीक्षण रिपोर्ट में पोषक तत्वों की वास्तविक स्थिति जानने के बाद ही संतुलित मात्रा में खाद का प्रयोग करें।
प्रदूषित गाद से सतर्क रहने की जरूरत
डीएओ ने स्पष्ट किया कि हर प्रकार की गाद खेत के लिए मुफीद नहीं होती। यदि गाद किसी औद्योगिक नाले, सीवेज या प्रदूषित जलस्रोत के बहाव से आई है, तो उसमें विषैले और हानिकारक रसायन हो सकते हैं। ऐसी गाद का उपयोग बिना जांच के कतई न करें। किसान पहले जल निकासी सुनिश्चित करें, गाद के स्रोत व मोटाई की जांच करें और वैज्ञानिक सलाह के आधार पर ही फसल चक्र का चयन करें।
हिन्दुस्थान समाचार / विनोद सिंह

