पिपरा के सुभाष चौक स्थित दुर्गा मंदिर में बंगाली परंपरा से होती है पूजा, 1958 से पहले से जुड़ा है इतिहास

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पिपरा के सुभाष चौक स्थित दुर्गा मंदिर में बंगाली परंपरा से होती है पूजा, 1958 से पहले से जुड़ा है इतिहास


सुपौल, 18 अक्टूबर (हि.स.)। पिपरा बाजार के सुभाष चौक स्थित दुर्गा मंदिर अपनी ऐतिहासिक विरासत और अनूठी बंगाली पूजा परंपरा के लिए क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है। यहां दशहरा के अवसर पर सदियों पुरानी बंगाली रीति-रिवाज के अनुसार मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है। इस विशिष्ट परंपरा को देखने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। शारदीय नवरात्र को लेकर मंदिर परिसर में सजावट का काम शुरू हो गया है। पूजा की तैयारियों के साथ ही बाजार में भी उत्सवी माहौल बनने लगा है।

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मां दुर्गा की प्रतिमा पर चढ़ाए जाने वाले अंग-वस्त्र और आभूषण सहित कई आवश्यक पूजन सामग्री बंगाल से मंगाई जाती हैं। यहां पूजा-अर्चना बंगाली पद्धति से संपन्न होती है और इसके लिए बंगाली पुरोहित विधि-विधान का निर्वहन करते हैं। परंपरा के अनुरूप होने वाली पूजा श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण का केंद्र रहती है। मंदिर प्रबंधन से जुड़े लोगों के अनुसार, वर्ष 1958 से पहले यहां कच्चे घर में दुर्गा मंदिर स्थापित था। बाद में इसे हटाकर पक्के मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर के पक्के निर्माण में मधुसूदन डे और शारदा प्रसाद डे की प्रमुख भूमिका रही। इसके बाद से यहां बंगाली पूजा पद्धति के अनुसार दुर्गा पूजा की परंपरा निरंतर चली आ रही है। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा ने मंदिर को धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक पहचान भी प्रदान की है। यहां दुर्गा पूजा के दौरान बंगाली परंपरा के अनुसार कई विशिष्ट धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। पूजा के छठे दिन बेल वृक्ष के नीचे कलश स्थापना की जाती है। इसके बाद सप्तमी के दिन केले के पौधे को स्नान कराकर उसे धोती पहनाई जाती है। विधि-विधान के साथ सजाए गए केले के पौधे को निकटवर्ती पोखर तक ले जाया जाता है, जहां स्नान कराने के बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूजा-अर्चना की जाती है। इस अनुष्ठान का बंगाली दुर्गा पूजा में विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। मंदिर में प्रचलित पूजा पद्धति की एक अन्य विशेषता बलि से जुड़ी परंपरा है। मंदिर प्रबंधन से जुड़े लोगों के अनुसार, यहां निशा और वैष्णव पद्धति से जुड़े रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। परंपरागत पशु बलि के स्थान पर झींगे को प्रतीकात्मक बलि के रूप में अर्पित किया जाता है। इसके अलावा बंगाली महिलाएं अपने घरों से प्रसाद तैयार कर मंदिर लाती हैं, जिसे मां दुर्गा को भोग लगाया जाता है। दुर्गा पूजा के आठवें दिन कुंवारी कन्याओं की पूजा-अर्चना की जाती है। इस अवसर पर मंदिर कमेटी की ओर से कन्याओं को वस्त्र प्रदान किए जाते हैं। धार्मिक आस्था से जुड़े इस आयोजन में श्रद्धालु उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। पूजा के दौरान बंगाली परंपरा, वैदिक मंत्रोच्चार और स्थानीय श्रद्धालुओं की सहभागिता मंदिर परिसर को भक्तिमय बना देती है। युवक संघ के सदस्य जुटे तैयारियों में

दुर्गा पूजा आयोजन को सफल बनाने के लिए मंदिर कमेटी और बाजार के युवक संघ के सदस्य सक्रिय हैं। कमेटी में अध्यक्ष बद्री प्रसाद गुप्ता, सचिव शंकर चौधरी और निताय डे सहित अन्य सदस्य तैयारियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। मंदिर की सजावट, पूजन व्यवस्था और श्रद्धालुओं की सुविधा को लेकर तैयारियां की जा रही हैं।

पिपरा के सुभाष चौक स्थित यह दुर्गा मंदिर धार्मिक आस्था, बंगाली संस्कृति और ऐतिहासिक परंपरा का संगम है। वर्षों से चली आ रही पूजा पद्धति आज भी यहां की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए है। यही वजह है कि दशहरा के अवसर पर इस मंदिर में होने वाली पूजा को देखने और मां दुर्गा का आशीर्वाद लेने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / विनय कुमार मिश्र

Livevns.news Desk
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